इक आस Read Count : 19

Category : Poems

Sub Category : N/A
इक आस थी मन में दबाए बैठा
कहना चाहूं जो छुपाए था बैठा
 देखी थी आपकी जब पहली झलक,
 में झपक ना पाया था अपनी पलक,
 मन गया था मेरा आप पर अटक।।
आपकी सूरत,आपकी सीरत ऐसे उतरी मन में मेरे,
मन प्रफुल्लित हो उठा ,भूल गया सब सब कष्ट मैं मेरे।।
आए कई सुंदर चेहरे मेरे नैनो के सामने
नयन ना अटके मेरे किसी पर,
नजाने क्या जादू किया है आपने?
""दर्शन इतने दुर्लभ आपके, मुख पर इतना तेज है,
केश आपके जाल है जैसे, हाथो में कोमल स्नेह है,
नेत्र जैसे मधुशाला है , मैं हार बैठा हूं इनमे सबकुछ,
उस शहद सी वाणी के चक्रव्यूह मै
मैं गंवा बैठा हूं अपनी सुध बुध।।""
आपकी एक मुस्कान के आगे सारी खुशियां फीकी है,
एक झलक आपकी पाने को मैने कितनी रातें सींची है।
काया इतनी कोमल लगे की अमृत जैसी माया हो,
जैसे रूप बदलकर धरती पर स्वर्ग से अप्सरा आई हो।।
मीरा जैसे पागल थी कान्हा के अनुराग में,
दशा वही है मेरी भी बस वहां कान्हा यहां आप है ।।
उन मृगनैनी नेत्रों ने सम्मोहित कुछ ऐसे किया
मैं डूबता उनमें जा रहा पर बचने का ना प्रयास किया।।
चंद्रमा जैसी शीतल हो, सूर्य जैसा तेज है,
परों के जैसी कोमल हो, और अमृत जैसी विशेष।।
अब पास नही हो आप तो इस पर क्या विलाप करू
भाग्य में जो हो नही उस पर क्या संताप करू।।
प्रशंशा के ये शब्द नही हृदय से निकले बोल है,
साधारण हम आपके लिए पर आप बहुत अनमोल हो,
एक आस यही अब मन में है , की आप हमारे पास हो,
स्वप्न में मै जैसा देखू तुमको वैसा ही एहसास हो।।
बहुमूल्य हो आप मेरे लिए ये बताने है जतन किया,
आपसे मन को भटकाने का मैंने बहुत प्रयत्न किया,
अटक गया है आपके ऊपर कही और अब लगे नही,
शायद मृत्यु के बाद ही सही 
विलुप्त हो जाए ये एहसास कही।।


Comments

  • No Comments
Log Out?

Are you sure you want to log out?