
पिताजी
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Category : Poems
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आज भी शाम को आपको फ़ोन करने का मन करता हैआज भी दोपहर को खाने पर इंतेज़ार रहता हैघर सूना है, घास भी बढ़ गई है,कुर्सी पर साफ तौलिया लगवाया है,सबको मालिक के आने की आस हैसब्जी में तेल ज्यादा हैमसाला भी तेज हैपर अब किसी के डांटने की आवाज़ नही आतीकमरा आज भी तितर बितर ही हैकिताबें और फाइले वैसे ही पड़ी हैउनको भी किसी के आने का अहसास हैऐसे तो जाने की उम्मीद न थीआप ही सब कुछ थेयही सोच कुछ दिन और रुक गए होते।
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