अनोखी साम और जिंदगी Read Count : 17

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परेशान बैठा था एक दिन अकेला अपनी बालकनी में खुशियों का पता पूछना था मुझे अपनी जिंदगी से
 ये सवाल मेरे जहन में ऐसे उतरा की सोचते सोचते ऐसा लगने लगा की चारो तरफ जैसे हल्का हल्का अंधेरा होने लगा था आंखो को अनदेखा सा अहसास होने लगा था जैसे संध्या का समय हुआ हैं और चारो तरफ चमकीली रौशनी बिखरने लगी हैं  ऐसा लग रहा था की खुशियों की बारात निकलने वाली हो
में तो बस इस पल को अपनी कल्पना में सिमटा के ख्यालातो से मिलवा ने लगा था
ऐसा लग रहा था मेरे  चेहरे पर एक बड़े अरसे के बाद एक खुशी का पल ठहरा हो
में अचानक से खुशियों में ऐसे झूमने लगा जैसे मैंने उत्साह और उमंग की मदिरा का सेवन किया हो
 ऐसा अहसास होने लगा की कुछ लोग एक दूसरे का हाथ थाम कर बस यू बेवजह गुनगुना रहे थे वैसे मेरा हाथ थामने वाला कोई नि था लेकिन में अकेला होके भी अकेला नि था ऐसा लग रहा था की किसी अनकही अनदेखी खुशी ने मेरा हाथ थाम लिया हो और इस अनोखी शाम के सफर पर मस्तमग्न चलने लगा सबसे खास बात ये थी लोगो के मन में न तो कल का कोई इंतजार था न ही पीछे छूटे लम्हों का कोई गम ऐसा लग रहा था लोगो से मिलने उनकी जिंदगी आ रही हो 
मेरा सफर तो उस रौशनी की तरफ चल दिया जो कही दूर किसी किनारे से आराही थी मेरे कदम भी अंजान रौशनी की तरफ बड़ने लगे ऐसा लग रहा था मेरी पहचान खूबसूरत पलो से होने वाली हो लेकिन रौशनी के नजदीक पहुंचते हुए ऐसे लगने लगा समय का यहां आस्तित्व ही खतम हो गया हो लेकिन
अचानक ऐसा अहसास हुआ कि कोई मुझे पीछे की ओर खीच रहा हो और अचानक से रौशनी और आवाज कही गुम सी होने लगी थी 
ऐसा लगने लगा की समय ने अपनी दिशा बदल ली हो
अचानक ऐसा लगने लगा की आंखे मेरी बस अधेरे से भर गई हो आंखे जब खुली तब अहसास हुआ बालकनी में बैठे बैठे रात हो गई थी पर उस समय लगा शायद मेरे सवाल का मुझे जबाब मिल गया था की अगर खुशियों को तलाशता रहा तो सारी जिंदगी यू ही दुखो में निकल जाएगी खुशियों को तो जिंदगी के हर पल में महसूस करना चाहिए  
और खुली आंखों से देखा इस अनोखी साम का ख्वाब मुझे अनदेखी खुशियों का पता देके खतम हो गया था

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