बड़ी हवेली Read Count : 171

Category : Books-Fiction

Sub Category : Horror

रात के बारह बज चुके थे तनवीर (तन्नू) इलाहाबाद से कानपुर पहुंचा रोडवेस की बस से। उसके बस से उतरते ही एक अधेड़ उम्र का आदमी उसकी ओर हाँथ बढ़ा कर बैग को थामते ही बोला " कहाँ चलेंगे बाबूजी, मैं रिक्शे वाला" दूसरे हाँथ से रिक्शे की ओर इशारा करते हुए। उसकी आवाज़ से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो दिसम्बर की ठंड और भूख ने उसके गले को बैठा दिया हो तभी तो वो भागता हुआ पहुंचा था अपनी सवारी के पास। तन्नू ने उसकी ओर देखते हुए कहा  " बड़ी हवेली चमन गंज जाना है, कितने लोगे"? 1978 की उस कड़ाके की ठंड में केवल चार रिक्शे वाले और दो तांगे वाले ही दिख रहे थे हर जगह कोहरे ने चादर चढ़ा रखी थी। रिक्शे वाले ने कहा " 10 रुपए दे दीजिएगा, ठंड भी तो है सरकार"। तन्नू ने रिक्शे की तरफ़ चलते हुए कहा " ठीक है चलो "। 

रिक्शे पर सवार होते ही तन्नू ने अपने जैकेट से सिगरेट का पैकेट निकाला एक सिगरेट उसमें से निकला और पैकेट वापस जैकेट की जेब में रख दिया उसी जेब से लाइटर निकाला और सिगरेट जलाई। एक लम्बा कश लगा कर अन्दर खिंचा और राहत की साँसों के साथ सिगरेट का धुआं बाहर छोड़ा। उसका चेहरा तनाव रहित लग रहा था। उसने रिक्शे वाले से पूछा "रात भर रिक्शा चलाते हो क्या, परिवार नहीं है क्या शहर में"? रिक्शे वाले ने जवाब दिया "नहीं बाबूजी , दो बजे तक चलाएंगे फ़िर कमरे पर जा कर आराम करेंगे, सुबह 9 बजे से Elgin mill में काम करते हैं, यहीं पास के गांव के हैं इसलिए परिवार नहीं रखा शहर में"।    "अरे वाह! तुम तो काफ़ी मेहनती मालूम पड़ते हो, कितना पढ़े लिखे हो", तन्नू ने उसकी ओर देखते हुए पूछा ।" मैट्रिक पास हैं बाबूजी" रिक्शे वाले ने जवाब दिया। सिगरेट का आखिरी कश ख़त्म होते ही चमन गंज पहुंच गया था तन्नू। रिक्शे वाले ने हवेली के पास रिक्शा रोकते ही कहा" लीजिए पहुंच गए बाबूजी बड़ी हवेली।" तन्नू ने अपनी जेब से बटुवा निकाला उसमें से दस रुपए का नोट रिक्शे वाले को दिया फ़िर बटुवा जेब में रखते ही बैग को कंधे पर टांग लिया और हवेली की तरफ़ बढ़ने लगा।

हवेली के गेट पर चौकीदार बैठा था उसे तन्नू के आने की ख़बर शायद पहले से ही थी इसलिए तो उसने नाम सुनते ही गेट खोल दिया। तन्नू हवेली के मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ा। चौकीदार ने उसके हाथ से बैग लेकर अपने कंधे पर टांग लिया था और दूसरे हाथ में लालटेन थाम रखी थी। दरवाजे पर पहुंच उसने कुंडा खटखटाया। 

कुछ देर में दरवाजे को एक 18 साल की सुन्दर लड़की ने खोला। उसने तन्नू कि ओर देखते ही एक नादान सी मुस्कान अपने चेहरे पर झलकाई। तन्नू भी उसकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोला "तुम शहनाज़ हो न, डॉक्टर अंकल की बेटी, कितनी बड़ी हो गई हो।" शहनाज़ ने उसे उसकी अम्मी के कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए कहा "आप भी तो कितने खूबसूरत हो गए हैं" उसने जारी रखा " अब आंटी को देखने वाला कोई नहीं था इसलिए मुझे पापा ने रुकने को कहा, लेकिन अब आप भी आ गए हैं तो एक से भले दो"।  

उसने तन्नू की अम्मी के कमरे का दरवाज़ा खोला उसकी अम्मी रज़ाई  के अंदर लिपटी पड़ी थीं। उन्हे Alzheimer नाम का दिमागी रोग हुआ था उनकी हालत ज़्यादा नाज़ुक थी इसलिए तन्नू को तुरन्त बुलवाया गया था। 

तनवीर नवाबों के परिवार से ताल्लुक रखता था और पढ़ाई करने के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दाखिला दिलवाया गया था। उसके वालिद ने गुज़रने से पहले सब कुछ उसके नाम पहले ही कर दिया था क्यूँकि वह अपनी बेगम की तबीयत के बारे में जानते थे। यूँ तो तनवीर की अम्मी लखनऊ की हवेली में रहा करती थीं लेकिन अपने शौहर के गुज़रने के बाद कानपुर की बड़ी हवेली में रहने लगीं थीं। 

तन्नू ने शहनाज़ से  अपनी अम्मी की सारी जानकारी ली क्यूँकि वह सो रही थीं इसलिए उसने जगाना सही नहीं समझा। 

शहनाज़ ने तन्नू को उसके कमरे की ओर ले जाते हुए कहा " तुम इस हवेली में पहली बार आए हो न, इसलिए तुम्हें बता रही हूँ नीचे बेसमेंट में कभी मत जाना । सब कहते हैं उसमें एक रूह रहती है। तुम्हारी अम्मी को भी यहाँ नहीं आना चाहिए था यहाँ आते ही उनकी तबीयत ज़्यादा खराब हो गई।" 

" तुम भी न बच्चों जैसी बातें करती हो शहनाज़ आज के ज़माने में कहीं कोई मानेगा इन सब बातों को। अच्छा ये बताओ तुम्हें कितनी बार पकड़ा उस रूह ने " तन्नू ने मुस्कुराते हुए पूछा । 

" मज़ाल है मेरे सामने कोई रूह आ जाए मेरे गले में पीर बाबा का ताविज़ है, तुम्हारे लिए भी ला दूँगी" शहनाज़ ने इतराते हुए कहा। 

उसने एक कमरे के दरवाजे के सामने रुकते ही कहा" लीजिए हुज़ूर आपका कमरा आ गया "। तन्नू ने दरवाजा खोला और अंदर बिस्तर की ओर बढ़ा वो काफ़ी थक चुका था उसने तुरंत ही ख़ुद को बिस्तर पर फेंक दिया। शहनाज़ ने उसकी ये हरकत देखी और लालटेन को टेबल पर रख दिया जो बिस्तर के पास ही था फ़िर तन्नू की ओर देखते हुए कहा "अच्छा अब मैं चलती हूँ, तुम भी आराम से सो जाओ सुबह बातें होगीं"। तन्नू ने उसकी ओर देखते हुए कहा "गुड नाइट" शहनाज़ ने भी इसका जवाब गुड नाइट बोलकर दिया। 

तन्नू को रात में प्यास लगी उसकी नींद खुल गई उसने घड़ी में देखा तो सुबह के तीन बजे हुए थे वो बिस्तर से उठकर रसोई की तरफ़ बढ़ा। इतने में एक आवाज़ ने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वो आवाज़ शायद बेसमेंट से ही आ रही थी। आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होने लगी ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने हांथों से दरवाज़े को ज़ोर ज़ोर से पीट रहा हो। तनवीर के कदम रुके नहीं वो सीधा बेसमेंट की ओर लपका और दरवाज़े के सामने खड़े होकर आश्चर्य के स्वर में पूछा "कौन है, कौन है अंदर"? तन्नू ने अपने कान दरवाज़े पर रख दिए ताकि सुन सके कि अन्दर से कोई आवाज़ आती है या नहीं लेकिन इतने में दो भयानक हाँथ दरवाज़ा तोड़ते हुए बाहर निकल कर तन्नू को गर्दन सहित पकड़ लेते हैं। तन्नू अपनी आँखो को बंद कर के ज़ोर से चिल्लाया "बचाओ, बचाओ" जब आँखें खोलीं तो देखा सुबह हो चुकी थी , सूरज सिर पर आ चुका था और चिड़ियों की आवाज़ों से सारा वातवरण उत्साहित हो रहा था। अगली सुबह तनवीर (तन्नू) अपने बिस्तर से उठ कर फ्रेश होने के बाद सीधा डाइनिंग टेबल पर जा पहुंचा। शहनाज़ पहले से ही वहाँ मौजूद थी और जूस पी रही थी। तन्नू ने उससे भूमिका बांधते हुए पूछा "अच्छा कल जो तुम उस बेसमेंट वाली रूह के बारे बात कर रही थी शहनाज़ इसका और भी कोई चश्मदीद गवाह है या ये तुम्हारे ही दिमाग की उपज है"। "तुम्हें क्या लगता है मैं क्या कोई पागल हूँ जो अपने से भूत आया, भूत आया चिल्लाउंगी सिर्फ मैं ही नहीं और भी गवाह हैं जिन्होंने ये दावा किया है कि उन्होंने रूह को देखा है " शहनाज़ ने काफ़ी आत्मनिर्भरता से जवाब दिया।  " तो ठीक है आज इस रहस्य को भी और नज़दीक से जानने का मौका मिलेगा, पहले ज़रा नाश्ता कर के अम्मी से मुलाकात कर लूँ फ़िर हम दोनों मिलकर इस मसले का तहकिकात करेंगे" तन्नू ने काफ़ी उत्साहित होकर कहा। " निहारिका ओ निहारिका , ज़रा नवाब साहब के लिए नाश्ता लगाना" शहनाज़ ने पुकारते ही तन्नू की तरफ देख कर आँख मार दी। तन्नू भी अपनी मुस्कान न रोक पाया वो उस शख्स को देखने के लिए उत्साहित था जिसका शहनाज़ ने नाम पुकारा था। निहारिका वाह नाम सुनते ही लगता है ज़रूर किसी अप्सरा का होगा तन्नू ने मन ही मन सोचा और मुस्कुराने लगा।

थोड़ी देर बाद एक हसीन युवती नाश्ता लेकर अन्दर से आई, उसे देखते ही तन्नू के होश फाख्ता हो गए। वो बला की खूबसूरत थी कोई भी उसे देखकर नहीं कह सकता था कि वह घर कि नौकरानी है। कटिले नैन नक्श, गोरा रंग, लम्बा कद और गदराया बदन। उसे देखते ही कोई भी लड़का उसका दीवाना बन जाता। निहारिका ने नाश्ते की प्लेट तन्नू के सामने रख दी और साथ ही टेबल पर गोभी, आलू, मूली, मेथी आदि के तरह तरह के पराठे थे। तन्नू ने बटर नाइफ से थोड़ा बटर निकाल कर प्लेट में डाला और सोचने लगा कौन सा पराठा पहले खाऊँ। इतने में शहनाज़ बोली" ये गोभी वाला पहले खाओ", उसने एक गोभी का पराठा उसकी प्लेट में डाल दिया। तन्नू ने खाना शुरू किया "वाह! क्या बात है, ऐसा गोभी का पराठा आज तक नहीं खाया" तन्नू ने पराठा मुँह में डालते हुए कहा। "अच्छा है न, इस हवेली में काम करने वाले रसोइए बहुत अच्छा खाना पकाते हैं " शहनाज़ ने तुरंत ही कहा। 

"और कुछ चाहिए नवाब साहब को" निहारिका ने तन्नू की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए पूछा। तन्नू ने भी मुस्कुराते हुए नहीं के इशारे में गर्दन हिला दी, निहारिका समझ गयी और अपना काम करने वापस जाने लगी। 

तन्नू ने अपना नाश्ता ख़त्म किया और टेबल से सीधा उठकर शहनाज़ के साथ अम्मी के कमरे की तरफ़ बढ़ने लगा। कमरे में पहुँचते ही देखा अम्मी एकटक छत को देख रही थी। उसने अम्मी को देख कर पूछा "अम्मी अब कैसी तबीयत है आपकी"। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने तीन चार बार और पूछा लेकिन बिलकुल सन्नाटा। इतने में शहनाज़ बोली " मैंने सवेरे का डोस दे दिया है जैसा पापा ने बताया था, थोड़ी देर बाद इन्हें नींद आ जाएगी, इनके लिए आराम करना बहुत जरूरी है"। शहनाज़ ने जैसा बोला था वैसा ही हुआ थोड़ी देर बाद तन्नू कि अम्मी की पलकें भारी होने लगीं जिन्हें अब खुला रखना तनवीर की अम्मी के बस में नहीं था और वह गहरी नींद में सो गईं।

तन्नू और शहनाज़ अपने तय किए हुए कार्य पर लग गए उन्होंने हवेली के सभी नौकरों को बुलवाकर पूछताछ की। उनमें से ज़्यादातर का यही कहना था कि उस बेसमेंट में से कभी कभी किसी के चलने की आवाज आती है। उन्होंने इस बात का भी ज़िक्र किया कि उनमें से कुछ ने वहां तेज़ लाल रोशनी जलते हुए देखा है।

सभी से पूछताछ करने के बाद तन्नू ने शहनाज़ की तरफ देख कर कहा "इसका मतलब यह है कि इस हवेली में सही में कोई रूह है लेकिन तेज़ लाल रोशनी का क्या मतलब है, अच्छा शहनाज़ तुम्हें पता है इस हवेली को कब खरीदा गया या इससे पहले इसमें कौन रहता था, इन सब बातों का पता चलना बहुत जरूरी है तभी किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है"। शहनाज़ ने कुर्सी से उठ कर तन्नू के इर्दगिर्द चलते हुए अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़ते हुए कहा" जहाँ तक मेरी जानकारी में है तुम्हारे अब्बू ने इस हवेली को गुज़रने से पाँच साल पहले ही लिया था उन्होंने इस हवेली को अपने पुरातत्व विभाग के दोस्त और सह कर्मचारी डॉ ज़ाकिर से खरीदा था, उन्हे लंदन की यूनिवर्सिटी से बुलावा आ गया था और उन्होंने जाने से पहले ये हवेली तुम्हारे अब्बू को बेच दी। शहनाज़ ने बोलना जारी रखा " तुम्हारे अब्बू के गुज़रने के बाद घर का खर्चा हवेली के रख रखाव में दिक्कत आने लगी थी इसलिए मुनीम जी और बाकी के जिम्मेदार सदस्यों ने ही लखनऊ की हवेली बेचने का फैसला किया था फिर भी खर्चा चल ही रहा है कई जगह खेती से अच्छी खासी आमदनी जो हो जाती है। तुम्हारे अब्बू और डॉ जाकिर इस हवेली में अपने प्रयोग की कुछ वस्तुएं भी रखते थे, मैंने ऐसा सुना है "। 

तन्नू काफ़ी गंभीरता से इस बड़ी हवेली के खयालों में खो गया। तन्नू अपने खयालों में ये सोचता रहा कि आखिर उस तहखाने में ऐसा क्या होगा जिससे सभी हवेली के नौकर डरें हुए हैं क्यूँ न तहखाने को एक बार खोलकर देखा जाए। "मैं कल ही उस तहखाने को खोलता हूँ", तन्नू ने मन ही मन सोचा।

शाम हो चली थी तन्नू ने अपनी अम्मी को दवाई खिलाई और हाल में चिमनी के पास आकर बैठ गया। निहारिका तुरंत उसे चाय की प्याली देती है। तन्नू निहारिका की तरफ बड़े प्यार से देखता है और पूछता है "घर में कौन कौन है?"

निहारिका ने जवाब दिया, " कोई नहीं  है नवाब साहब"। 

तन्नू चाय की चुस्की तो ले ही रहा था साथ ही निहारिका की कमर को देख रहा था। उस गदराए हुस्न की मलिका की कमर बिलकुल  चिकनी नज़र आ रही थी। वो उसे हसरत भरी निगाहों से देख रहा था और उसके मन में उसे छू लेने का विचार आ रहा था। इतने में कमरे में शहनाज़ आ जाती है और तन्नू की तरफ देख कर कहती है "क्या हुआ नवाब साहब, क्या खिचड़ी पक रही है दिमाग में", तन्नू ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा और कहा "कुछ नहीं बस यूँही चाय की चुस्की ले रहा हूँ", " तुम्हें भी पीनी हो तो बनवाऊँ" तन्नू ने अपनी नज़र चुराते हुए कहा।

"रहने दीजिए, मैं ख़ुद ही बना लूँगी" शहनाज़ ने तन्नू की ओर देखते हुए कहा। इतने में तन्नू ने उससे पूछा "अच्छा शहनाज़ क्या कल तुम मेरे साथ तहखाने में चलोगी "," न बाबा न, क्या मुझे पागल कुत्ते ने काटा है " शहनाज़ ने बोला।" तुम भी क्या बच्चों जैसी बातें करती हो, आज के ज़माने में तुम भूत प्रेत जैसी बातें करती हो" तन्नू ने निडरता दिखाते हुए कहा। 

"मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ " निहारिका ने कहा।" बहुत अच्छा हम तीनों कल ही तहखाने में चलेंगे इस बात का पता लगाने की आखिर उस तहखाने में ऐसी क्या चीज़ छुपी हुई जिससे घर के बाकी नौकर इतना डरे हुए हैं ", तन्नू ने उन दोनों नौजवान लड़कियों से कहा जिनके चहरे पर गंभीरता के साथ डर साफ़ झलक रहा था।

रात काफ़ी हो चली थी खाने की टेबल पर एक दूसरे को गुड नाइट कहने के बाद शहनाज़ और तन्नू अपने अपने कमरों में सोने चले गए। तन्नू ने अपने कपड़े बदले और नाइट सूट में बिस्तर पर सोने चला गया। कुछ देर बाद तन्नू की नींद खुली उसने अपनी घड़ी में देखा तो तीन बजे हुए थे। उसे ज़ोर से प्यास लगी थी लेकिन बगल में रखे जग में पानी ख़त्म हो गया था। उसने अपने मन में सोचा "बड़ी अजीब बात है, अभी तो पानी भर के रखा गया था सोने से पहले एक बार भी नही पिया तो फिर ये पानी कैसे खत्म हो गया", तन्नू ने इतना सोचा ही था फिर उठकर किचन की ओर बढ़ने लगा कि अचानक उसे किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी उसने पहले तो इस बात को नज़रअंदाज़ किया लेकिन फिर जब आवाज काफ़ी ज़ोर से आने लगी तो उसने उस आवाज़ का पीछा किया। वह कदमों की आहट उसे तहखाने के पास ले गई। कदमों की आहट इतनी साफ़ सुनाई पड़ रही थी कि कोई भी दूर से सुन ले और दरवाज़े के नीचे दरार से लाल रोशनी चमकती हुई दिखाई पड़ रही थी। तन्नू तहखाने के दरवाज़े के निकट आया तो कदमों की आहट थोड़ी धीमी पड़ गई, उसने जैसे ही दरवाज़े पर कान टिकाए अचानक एक खौफनाक हाँथ बाहर निकल कर आता है दरवाज़ा तोड़ते हुए और तन्नू को जकड़ लेता है। तन्नू घबराहट में अपनी आँखे बंद कर के ज़ोर से चीखता है "बचाओ, बचाओ", इतने में उसकी आँखें खुल जाती हैं तो देखता है निहारिका खिड़की का पर्दा हटा रही थी और सुबह का सूरज निकल चुका था। उसने तन्नू की ओर देखते हुए कहा "किसने पकड़ लिया नवाब साहब, आपको किससे बचाना है", तन्नू ने बात को बदलते हुए कहा "जिसे पकड़ना है वो तो कभी पकड़ती नहीं है जिसे नहीं पकड़ना होता है वो सपनों में भी पकड़ लेता है"। तन्नू का शरारत भरे जवाब का मतलब शायद निहारिका समझ गई थी इसलिए उसकी ओर मुस्कुराते हुए बोली" अब जल्दी से तैयार भी हो जाइए और नाश्ते की टेबल पर आ जाइए, याद है न आज तहखाने की छानबीन करनी है "।

तन्नू तैयार होकर टेबल पर पहुंच जाता है जहाँ शहनाज़ पहले से ही मौजूद थी।

तन्नू ने शहनाज़ को गुड मॉर्निंग कहा वापसी में शहनाज़ ने भी उत्तर दिया। नाश्ता ख़त्म होते ही तीनो पहले तन्नू की अम्मी को देखने गए उनकी हालत में सुधार तो था लेकिन वह किसी से बात चीत नहीं करतीं थीं। निहारिका और शहनाज़ ने उन्हें दवाईयां देकर आराम से बिस्तर पर लेटा दिया क्यूँकि उनकी दवाइयां ऐसी थीं कि किसी भी इंसान को कुछ देर में सुला देतीं।

उनके सो जाने के बाद तीनों तहखाने की ओर चल दिए। हो सकता है कि इस तहखाने में कुछ ऐसा राज़ छुपा हो जिसे आज तक कोई ढूँढ न पाया हो, शायद कोई खज़ाना हो या छुपा हुआ रहस्य जो तीनों को अमीर बना दे, हो सकता है कि लोगों की बात सही हो और यहाँ पर कोई भूत प्रेत हो, या ये भी हो सकता है कि सिर्फ एक वहम है जो लोगों ने पाल रखा है तन्नू के मन में ये सारी बातें चल रहीं थीं जैसे ही जैसे वह तीनों तहखाने की ओर बढ़ रहे थे। 

तहखाने के कमरे के बाहर एक बड़ा ताला लटका मिला तन्नू ने आसपास नज़र डाली तो देखा कोई ज़्यादा काम आने वाली चीज़ नहीं मिली बस एक लोहे की खंती रखी हुई थी उसने उस खंती को उठाया और तहखाने के कमरे के उस ताले को तोड़ दिया।

                                         

तन्नू ने तहखाने का ताला तोड़ तहखाने का दरवाज़ा खोला। निहारिका और शहनाज़ की हालत डर से खराब हो गई थी उन्होंने अपने अपने हांथों से कस कर पकड़ रखा था तन्नू को। तन्नू को भी उनके डर का अंदाज़ा हो गया था। पूरे तहखाने में धूल ने चादर चढ़ा रखी थी ऐसा लग रहा था मानो किसी ने सदियों से हाँथ न लगाया हो। चारों ओर दीवार पर मकड़े के जाल साफ़ नज़र आ रहे थे। तन्नू ने तहखाने में सामने रखी मेज़ पर देखा तो कुछ पुराने दस्तावेज रखे हुए थे, कुछ नक्शे थे और एक पेपर वेट भी था। निहारिका और शहनाज़ सामने रखी अलमारी खोल कर छान बीन कर रहे थे। उस तहखाने में कुल पाँच अलमारीयां थीं। तन्नू ने दस्तावेज की छान बीन से पता लगाया की उसके अब्बू शायद हिमालय की किसी गुफा के ऊपर काम कर रहे थे। कुछ दस्तावेजों से पता चला कि उस गुफा से उन्हें एक अमूल्य वस्तु प्राप्त हुई थी। उसका उन दस्तावेजों में ज़िक्र तो था लेकिन कहीं ये नहीं लिखा था वो क्या थी। तन्नू ने उन दस्तावेजों को अपने ओवर कोट के जेब में रख लिया और सामने की अलमारी की ओर बढ़ गया। सभी अलमारियों को देखने के बाद उसने सभी दस्तावेज एक जगह इकट्ठा किए वहीं थोड़ी दूर में एक बड़ा सा संदूक रखा हुआ था। उन तीनो ने उस पुराने संदूक को खोला उसमें एक कंकाल रखा हुआ था ऐसा लग रहा था काफ़ी पुराना है लेकिन उस संदूक के कंकाल का सिर गायब था। "आख़िर इसका सिर कौन ले गया होगा, और ये कंकाल यहाँ क्या कर रहा है", शहनाज़ ने अचंभित स्वरों में पूछा। तन्नू ने उसका उत्तर दिया "मुझे लगता है अब्बू और उनके दोस्त किसी प्रोजेक्ट पर हिमालय के पहाड़ों की गुफाओं पर गए थे वहाँ से उन्हें शायद ये कंकाल मिला होगा। यह कोई मामूली कंकाल तो है नहीं और इसे देखकर ऐसा लगता है कि काफ़ी समय से बर्फ़ में जमा हुआ होगा तभी इसके कोट में पानी से गलने के निशान हैं। "

" लेकिन नवाब साहब इसका सिर ग़ायब होने की क्या वजह हो सकती है," निहारिका ने तन्नू की ओर देखते हुए पूछा।" मुझे लगता है कि ये एक अंग्रेज का कंकाल है क्यूँकि इसके कपड़ों से तो यही पता चलता है, लेकिन ये बात तो मेरी भी समझ में नहीं आई कि इसका सिर कौन ले गया होगा और क्यूँ "। तन्नू ने कंकाल को ध्यान से देखा उसके कोट का आधा हिस्सा फंटा हुआ था। उसकी पतलून भी कई जगह से फंट सी गई थी। उसके पाँव में लॉन्ग बूट थे जो ज़्यादातर पहाड़ों पर चढ़ने वाले लोग ही पहनते हैं। तन्नू उन बूट को देखकर थोड़ी देर के लिये सोच में पड़ गया। फिर उन तीनों ने वहां से ज़रूरी कागज़ात बटोरे और तहखाने को बंद कर दिया। शहनाज़ एक नया ताला लेकर आई और उसने तन्नू को दे दिया तन्नू ने उस तहखाने के दरवाजे का कुंडा बंद कर के उसपे ताला लगा दिया। 

तीनों तहखाने से मिले कागज़ात को लेकर हॉल में आए। 

उन्होंने उन सभी दस्तावेजों को हॉल की एक बड़ी टेबल पर रखा। फिर तन्नू और शहनाज़ मिलकर उन दस्तावेजों की जांच पड़ताल करने लगे। निहारिका तन्नू की अम्मी के कमरे में उनका हाल पता करने चली गई।    

तन्नू और शहनाज़ ने दस्तावेजों से पता किया कि वो कंकाल काफ़ी कीमती था जिसे तन्नू के अब्बू अपने इंतकाल से पहले ही इस तहखाने में लेकर आए थे 

उस कंकाल का सिर काफ़ी कीमती और चमत्कारी था। तन्नू ने शहनाज़ की तरफ देखते हुए कहा "शायद उस कंकाल के सिर ग़ायब हो जाने की यही वजह थी कि वह चमत्कारी था लेकिन ऐसा कौन सा अंग्रेजी चमत्कारी कंकाल मिल गया था"? इतने में शहनाज़ ने कहा "मुझे लगता है कि उस कंकाल का सिर इस हवेली में आने के बाद ग़ायब हुआ था"। "यह बात तो तुमने बिलकुल सही कही लेकिन सिर ग़ायब किसने किया होगा ये अपने आप में एक पहेली है" तन्नू ने शहनाज़ से अचंभित भाव में कहा।

शाम हो चली थी सब कुछ देखते हुए तन्नू ने शहनाज़ से कहा" अच्छा अब चल कर नहा धोकर फ्रेश हो लिया जाए आज तहखाने की काफ़ी सफ़ाई कर ली है "। शहनाज़ भी उसकी बात मानकर अपने कमरे की ओर फ्रेश होने चली गई। दोनों फ्रेश होने के बाद डाइनिंग टेबल आ कर बैठ गए निहारिका उन दोनों के लिए कॉफी ले आई।

कॉफी पीते पीते शहनाज़ ने तन्नू से पूछा " क्या तुम्हें लगता है कि इस हवेली में इसी सिर कटे अंग्रेजी हुकूमत के सिपाही का भूत घूमता है"? तन्नू ने उसकी ओर देखते हुए कहा " तुम भी अजीब अजीब बातें करती हो, उस तेज़ लाल रोशनी का क्या जिसका ज़िक्र हवेली के सारे नौकरों ने किया था, आखिर वो लाल रोशनी उन सभी को तहखाने के रोशनदान से जलते हुए दिखने की क्या वजह हो सकती है "।" अगर उस कंकाल का सिर चमत्कारी है तो धड़ भी तो चमत्कारी होगा", निहारिका ने पूछा। तन्नू थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गया उसके मन में ये विचार आ रहे थे कि जब से वो इस हवेली में आया है उसने दो बार उस तहखाने में किसी के कदमों की आहट सुनी है, लगातार दो रातों को एक जैसे ही सपने, घड़ी में तीन बजे का घंटा दिखाई देना, ये सारी चीजें किसी ओर इशारा कर रहीं थीं लेकिन तन्नू ने बात बदलते हुए शहनाज़ से पूछा "अगर तुम्हें उस कंकाल का सिर मिल जाए तो तुम क्या करोगी"? "अगर वो सचमुच चमत्कारी हुआ तो उससे बहुत सारी दौलत मांग लूँगी और इस दुनिया पर शहज़ादी बनकर राज करूंगी" शहनाज़ ने पलक झपकते ही जवाब दिया। दोनों मिलकर हंसने लगे। रात काफ़ी हो चली थी निहारिका ने दोनों का खाना डाइनिंग टेबल पर लगा दिया और ख़ुद तन्नू की अम्मी के लिए सूप लेकर उनके कमरे की ओर चली गई। शहनाज़ और तन्नू खाना खाने लगे। 

                                         

डाइनिंग टेबल पर खाना खत्म होने के बाद तन्नू ने शहनाज़ को गुड नाइट बोला और निहारिका से अपने कमरे में पानी रखने का हुक्म दिया। निहारिका ने मुस्कुराते हुए गर्दन हिला दी।

तन्नू ने अपने कमरे में जाकर नाइट सूट पहना और अपने बिस्तर पर लेट गया। 

कुछ देर बाद निहारिका जग में पानी लेकर आई। तन्नू ने उसे अपने पास थोड़ी देर के बैठने को कहा निहारिका पहले तो थोड़ा घबराई लेकिन फिर पास ही कुर्सी पर बैठ गई। तन्नू ने उससे बिस्तर पर ही लेटे हुए पूछा " अच्छा निहारिका तुम इसी हवेली में ही रहती हो या कभी अपने घर भी जाती हो"। " जाती हूँ न नवाब साहब हर शनिवार को जाती हूँ और रविवार की शाम को वापस आ जाती हूँ" निहारिका ने तन्नू के प्रश्न का उत्तर दिया। "अच्छा कोई आशिक या मंगेतर है क्या तुम्हारा" तन्नू ने थोड़ा संकोच से पूछा।" नहीं नवाब साहब अब तक तो कोई आप जैसा कहाँ मिला " निहारिका ने शरारत भरे अंदाज़ में जवाब दिया जैसे वो जानती हो कि तन्नू ने ये प्रश्न उससे क्यूँ पूछा। तन्नू के चहरे पर मुस्कान खिल गई जैसे उसे किसी ख़ज़ाने की चाबी मिल गई हो लेकिन उसने अपने हाव भाव को काबू में रखते हुए निहारिका से कहा " अच्छा चलो अब तो मैं मिल गया हूँ, अब क्या ख़याल है"। निहारिका का चहरा शर्म से लाल हो चुका था उसने अपने चहरे को हाँथों से ढका और वहाँ से भागती हुई चली गई। तन्नू भी समझ गया लड़की हँसी तो फंसी उसका आधा काम हो चुका था बस अब इज़हार कर के आँखें चार और जिया बेकरार करना बाकी रह गया था। तन्नू ने ठण्डी आहें भरी और एक ग्लास पानी पिया फ़िर थोड़ी देर में सो गया।

रात का घनघोर अंधेरा बाहर छाया हुआ था और साथ ही उस पर कोहरे ने चादर चढ़ा रखी थी लेकिन शायद उस हवेली में किसी को चैन की नींद नहीं आ रही थी। कदमों की तेज़ आहट सुनकर तन्नू की नींद खुली। वो कुछ देर के लिए अपने बिस्तर पर ही लेट कर उन कदमों की आहट को सुनकर सोचने लगा। इतनी रात को कौन टहल रहा है हवेली में कहीं कोई चोर तो नहीं। वह अपने बिस्तर से उठा उसने अपना नाइट गाउन डाला और धीरे से अपने कमरे का दरवाज़ा खोला। तन्नू उन तेज़ कदमों की आहट का पीछा करने लगा। वह उसी जगह पहुँच गया लेकिन जो उसने देखा उस पर यकीन कर पाना शायद हर पढ़े लिखे युवक के लिए असंभव था। तन्नू ने देखा वही कंकाल हवेली में इधर-उधर घूम रहा था शायद वो अपना सिर ढूँढ रहा था।

तन्नू एक तरफ बड़ी सावधानी से छुप कर ये सब कुछ देख रहा था। एक ओर जहां उसके रौंगटे खड़े हुए थे वहीं दूसरी ओर उसके मन में सवाल भी था और वह ये था कि ये कंकाल उस तहखाने से बाहर कैसे आया वहाँ तो ताला लगा दिया था। तन्नू उस कंकाल का बड़ी सावधानी से पीछा करने लगा जैसे ही घड़ी ने तीन बजे का घण्टा बजाया वो कंकाल अपने तहखाने की ओर बढ़ने लगा। तन्नू भी उसके पीछे पीछे हो लिया। उसने देखा कि वह अंग्रेज का कंकाल अपने संदूक के अंदर जाकर लेट गया फ़िर संदूक अपने आप बंद हो गया और ठीक उसी तरह बंद हो गया हवेली के तहखाने का दरवाज़ा। तन्नू को बड़ी हैरत हुई ये सब देख कर। तन्नू सीढ़ियाँ चढ़ कर अपने कमरे में वापस आ गया और अपने बिस्तर पर लेट गया। लेट कर तन्नू ये सोचने लगा कि सब की बात सही साबित हो गई इस हवेली में हक़ीक़त में भूत है जो शायद रोज़ाना ही इस हवेली के चक्कर लगाता है शायद उसे अपनी खोपड़ी की तलाश है। यह सिर कटा कंकाल इस हवेली में तब तक घूमता रहेगा जब तक उसे अपना सिर नहीं मिल जाता लेकिन उस सिर को चुराया किसने होगा और क्यूँ चुराया होगा। शायद उस कंकाल की खोपड़ी कुछ ज़्यादा ही कीमती है उस कंकाल के लिए भी और उसे ढूंढने वाले के लिए भी।

तन्नू इसी सोच में सो नहीं पाया और देखते ही देखते सुबह हो गई। सवेरे होते ही उसने नाश्ता किया और सबसे पहले तहखाने में पहुंच गया लेकिन एक बार फिर वो हैरानी में पड़ गया उसने देखा कि तहखाने के दरवाजे पर ताला लगा हुआ है। उसने निहारिका को आवाज़ लगाई और उससे चाबी लाने को कहा।

निहारिका फौरन ही चाबी लेकर पहुंची उसने तन्नू को चाबी दे दी, तन्नू ने तुरन्त ही ताला खोल तहखाने का दरवाज़ा खोल दिया। निहारिका भी उसके साथ ही तहखाने में चली गई वो तन्नू को बड़ी हैरत से देख रही थी क्यूँकि तन्नू के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। उसने तन्नू से पूछा "आप क्या ढूँढ रहे हैं नवाब साहब"? तन्नू ने उसे पिछली रात की सारी घटना बताई और उसे सुन निहारिका डर गई । तन्नू ने सबसे पहले उस संदूक को खोला जिसमें कंकाल रखा था उसने कंकाल का अच्छी तरह से निरीक्षण किया फ़िर उसने उस संदूक का अच्छी तरह से निरीक्षण किया। उसे ये लगा कि शायद संदूक में कोई ऐसा सुराग छुपा हुआ हो जो उस कंकाल का राज़ बताने में मदद करे लेकिन उसके हाँथ निराशा ही लगी। फिर दोनों ने मिलकर संदूक बंद कर दिया और तहखाने का अच्छी तरह से निरीक्षण करने लगे। निहारिका ने तन्नू से फ़िर एक बार पूछा "हमलोग क्या ढूंढ रहे हैं नवाब साहब"? तन्नू ने जवाब दिया "इस समय कंकाल से संबंधित हर उस चीज़ की तलाश कर रहे हैं जो उन्हें उस चमत्कारी खोपड़ी तक ले जाए"। 


तन्नू और निहारिका ने अच्छी तरह से तहखाने में हर चीज़ की तलाशी ली ताकि उन्हें कुछ अहम सुराग़ मिल जायें जो उन्हें उस चमत्कारी खोपड़ी तक पहुँचा दें अंत में उन्हे तन्नू के अब्बू के दोस्त डॉ. ज़ाकिर की तस्वीर मिली जिसके पीछे उनका पता और फोन नंबर लिखा हुआ था। तन्नू ने अपने मन में सोचा कि "ये एक अहम सुराग़ है जो उन्हें उस चमत्कारी खोपड़ी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी दे सकता है"। निहारिका और तन्नू ने तहखाने को अच्छी तरह से बंद कर दिया और ऊपर हॉल की तरफ़ आ गए जहाँ शहनाज़ पहले से उनका इंतजार कर रही थी। उसने तन्नू और निहारिका से पूछा "तुम दोनों नीचे तहखाने में क्या कर रहे थे, इतनी बड़ी हवेली छोटी पड़ गई थी क्या जो कोना ढूंढने तहखाने में पहुंच गए थे"? तन्नू और निहारिका मुस्कुराये फ़िर तन्नू ने कहा "ऐसी कोई बात नहीं है कल रात हुए एक हादसे के बाद हम लोग कुछ ढूंढने के लिए तहखाने में गए थे"।" कौन सा हादसा ", शहनाज़ ने अचंभित स्वरों में पूछा। तन्नू ने विस्तार पूर्वक सारी बातें बताई जिसे सुन शहनाज़ मारे खौफ़ के थर थर काँप रही थी लेकिन उसने सब से अपने डर को छुपाते हुए पूछा" अच्छा तो कुछ मिला क्या नीचे तहखाने में "। तन्नू ने उसे डॉ. ज़ाकिर के बारे में बताया उसने शहनाज़ को बताया कि उसे डॉ. ज़ाकिर की तस्वीर मिली है जिसके पीछे उनका लंदन का पता और फोन नंबर भी लिखा हुआ है।

"ठीक है इस नंबर पर कॉल कर के पता चल जाएगा कि उस अधगले कंकाल और खोपड़ी का राज़ क्या है, अब तुम्हारी अम्मी को दवाई देने का समय हो गया है बाद में डॉ. ज़ाकिर के बारे में पता कर लिया जायेगा, चलो ज़रा दवाई पिलाने में मदद करो", शहनाज़ ने तन्नू और निहारिका से कहा। फिर तीनों तन्नू की अम्मी के कमरे में दवाई पिलाने चले गए।

तन्नू की अम्मी को दवा देने के बाद निहारिका बावर्ची खाने में नौकरों के ऊपर नज़र रखने चली गई इधर तन्नू और शहनाज़ हॉल में चिमनी के पास बैठकर बातें कर रहे थे। शाम हो चली थी और बाहर सूरज की रोशनी फिंकी पड़ने लगी थी ठंड होने के कारण कोहरे ने भी हल्की चादर चढ़ा रखी थी। इतने में अचानक फ़ोन की घंटी बजती है तन्नू फ़ोन का रिसीवर उठाता है और अपने कानो से लगाता है फिर भारी स्वरों में कहता है "हेलो", उधर से भी आवाज़ आती है "हैलो, कौन तनवीर, मैं शहनाज़ का अब्बू बोल रहा हूँ, अब तुम्हारी अम्मी की तबीयत कैसी, कुछ सुधार हुआ उनकी हालत में" शहनाज़ के अब्बू ने तन्नू से पूछा। तन्नू ने अपनी अम्मी का हाल उन्हें बताया और फिर शहनाज़ को अपनी तरफ आने का इशारा किया थोड़ी देर शहनाज़ के अब्बू से बात करने के बाद उनसे बोला" शहनाज़ भी यहीं खड़ी है अंकल लीजिए उससे भी गुफ्तगू कर लीजिए"।

शहनाज़ ने रिसीवर तन्नू के हाँथ से लिया और अपने दायीं तरफ कान से लगा लिया और बोली "हैलो, अब्बू आप कैसे हैं", उधर से आवाज़ आई "मैं तो ठीक हूँ बेटा तुम बताओ तुम कैसी हो","मैं भी अच्छी हूँ यहाँ काफ़ी ख़ुश भी हूँ, आंटी को दवा समय से दे रही हूँ आप इस बात की चिंता न करियेगा", शहनाज़ ने अश्वासन जताते हुए कहा। "मैं जानता हूँ तुम इस मामले में काफ़ी होशियार हो, अच्छा सुनो मैं कल हैदर को भेज रहा हूँ उसके स्कूल की छुट्टियाँ भी हो गईं हैं और वो तुम्हारे पास जाने की ज़िद किए हुए है", शहनाज़ के अब्बू ने उससे कहा।" ठीक है अब्बू हम लोग यहाँ उसका अच्छी तरह से ख़याल रख लेंगे", निहारिका ने एक बार फिर अश्वासन जताते हुए कहा और गुड बाय बोलकर फ़ोन का रिसीवर नीचे रख दिया। उसने तन्नू को हैदर के बारे में बताया उसने कहा कल वो यहाँ पहुँच जाएगा। तन्नू ने भी प्रसन्नता पूर्वक कहा "चलो अच्छा है हम सबका दिल भी लगा रहेगा "।

हैदर 7 साल का था और शहनाज़ का छोटा भाई था जिसके पैदा होने के चार साल बाद उन दोनों की अम्मी का इंतकाल हो गया था जिसके बाद दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी शहनाज़ के अब्बू ने बखूबी निभाई थी। दोनों बच्चों को कभी अपनी अम्मी की कमी नहीं खली। जहाँ शहनाज़ एक सुलझी हुई सुंदर लड़की थी वहीं हैदर बहुत शरारती और हाज़िर जवाब था। उसकी शरारतों के किस्से अक्सर उसके स्कूल से सुनने को मिल जाते थे। अब तक शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा हो कि हैदर की शरारतों की शिकायत उसके घर तक न पहुँची हो लेकिन पढ़ाई के मामले में हैदर अपनी क्लास में सबसे आगे था शायद यही वजह थी कि उसकी इतनी शरारतों के बावजूद उसे कभी निकाला नहीं स्कूल वालों ने।

रात काफ़ी हो चली थी निहारिका ने तन्नू और शहनाज़ को खाने के लिए बुलाया दोनों बावर्ची खाने के सामने वाले हॉल में रखी डाइनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठ गए। खाना खाने के बाद तन्नू ने शहनाज़ को रोज़ की तरह गुड नाइट कहा और अपने कमरे में सोने चला गया थोड़ी देर बाद उसके कमरे निहारिका ने रोज़ की तरह पानी का जग और ग्लास रख दिया। तन्नू ने निहारिका को आते और पानी रख कर जाते तक नहीं देखा क्यूँकि वह उस खोपड़ी और अधगले कंकाल के बारे में सोच रहा था, वो डॉ. ज़ाकिर और उनके कंकाल से संबंध के बारे में सोच रहा था, वो सोच रहा था कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जो डॉ. ज़ाकिर अचानक ही लंदन निकल गए हो सकता है उन्हें इस ज़िंदा लाश के बारे में जानकारी हो तभी उन्होंने अचानक ही लंदन की यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का आवेदन किया हो और उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया हो। तन्नू के सोचते सोचते ही काफ़ी रात बीत गई कि तभी अचानक बड़ी ज़ोरों की आवाज़ सुनाई पड़ी "धड़ाक", जैसे कहीं किसी ने दरवाज़े पर बहुत ज़ोर से एक लात मार दी हो और दरवाज़ा खुल गया हो।


डायरी -


  तन्नू, हैदर और सावित्री से मिलकर काफ़ी ख़ुश होता है, वह हैदर को एक खिलौने वाली कार भेंट करता है। हैदर यह देखकर काफ़ी उत्साहित हो जाता है। शहनाज़ ने सावित्री देवी को तन्नू की अम्मी के बारे में सारी जानकारी दे रखी थी यहाँ तक कि उन्हें यह बाते शहनाज़ के अब्बू ने पहले ही बता दी थी लेकिन शहनाज़ और सावित्री देवी तन्नू की अम्मी की ही बातें कर रही थीं। थोड़ी देर बाद दोनों वहाँ से तन्नू की अम्मी के कमरे में चली गईं। तन्नू और हैदर एक दूसरे के साथ ही बैठे रहे और कार के साथ खेल रहे थे।

देखते ही देखते काफ़ी समय बीत गया अब शाम हो चली थी और सूर्य की किरणों का प्रकाश धीमा पड़ गया था।

हवेली के ऊपर रूहानी ताकत का साया होने की वजह से रात का भोजन नौ बजे तक संपन्न हो जाता था ताकि नौकर भी फुर्सत पा कर हवेली के पीछे बने कॉटेजस में आराम करें। सारे नौकर रात के वक़्त हवेली के आस पास भी जल्दी नहीं आते थे। हालांकि उस रूहानी ताकत ने अब तक किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया था। 

शहनाज़, सावित्री और हैदर को सख्त हिदायत दे देती है कि किसी भी हाल में 12 बजे के बाद अपने कमरे से बाहर न निकले। सावित्री और हैदर के सोने का इंतज़ाम एक ही कमरे में कर दिया गया था। पहले तो वह अध गला अंग्रेजी कंकाल केवल तहखाने तक ही सीमित था और उसी तहखाने के रौशनदान से ही नौकरों ने देखा था लेकिन जब से तन्नू और शहनाज़ ने तावीज़ों से बँधा हुआ ताला तोड़ दिया तब से वह रूहानी ताकत गुस्से में हॉल के आस पास, कॉरिडोर में तथा कभी कभार सीढ़ियों के आस पास भी घूमता रहता है। 

सावित्री ये सुनकर काफ़ी भयभीत हो गई लेकिन हैदर शहनाज़ की बातों को सुनकर उसकी हँसी उड़ा रहा था। 

"छुटके मियां, जब तुम्हारा उससे सामना होगा ना तब पता चलेगा", शहनाज़ ने हैदर की ओर देखते हुए कहा। 

"अरे ये भूत वूत कुछ नहीं होता आपा , मैं तो कितनी बार अंधेरे में निकल जाता हूँ जहाँ सब कहते हैं भूत है लेकिन मुझे तो नहीं दिखता है कोई, उल्टा मैंने कितनों को भूत बनकर डराया है ", हैदर ने मासूमियत भरे अंदाज़ में कहा। सावित्री और शहनाज़ इस बात पर हंसने लगे।

रात में खाना पीना करने के बाद सभी अपने अपने कमरों में आराम करने चले गए। तनवीर भी अपने कमरे में गया और अपना नाइट सूट पहन कर बिस्तर पर लेट कर डायरी के बाकी भागों को पढ़ रहा था -

"अध गला कंकाल और खज़ाना मिलने के एक दिन बाद ही हमारी टीम के एक साथी के साथ की अनोखे रूप से मौत हो गई, उसकी आँखें बाहर की ओर निकल गई थी जैसे सूज कर मोटी हो गई हों। उसका निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ था, लेकिन हम सबकी समझ में ये नहीं आया कि आखिर उसने ऐसा क्या देख लिया था कि उसकी आँखें फट कर बाहर की ओर आ गईं थीं, चहरे पर अनजाने से खौफ़ का भाव था। हम सबके लिए ये एक दुखद घटना थी और एक बड़ा नुकसान भी क्यूँकि उसी सहयोगी ने सबसे पहले गुफ़ा की खोज की थी, वह काफ़ी होनहार नौजवान था जिसने डॉ ज़ाकिर के लिए कई रहस्यमयी स्थानों की खोज की थी। खुदाई का काम लगातार जारी था क्यूँकि ना तो इतना समय मेरे पास था और न ही डॉ ज़ाकिर के पास इसलिए अपने साथी के गुज़र जाने के ग़म को एक तरफ रख कर पूरी टीम बस उस बाकी के ख़ज़ाने को निकालने में लगी हुई थी क्यूँकि अब तक ख़ज़ाने के बारे में आस पास भी खबरें फैल ही गईं थीं, ऐसा उन पास के इलाके के मज़दूरों की वजह से हुआ जिन्हें डॉ ज़ाकिर और मेरी टीम के सदस्यों ने किराए पर खुदाई करने के लिए बुलाया था। हालाँकि पास के गांव से वह गुफा करीब 300km दूर थी और पत्थरीला रास्ता होने की वजह से कोई भी यातायात का साधन उपलब्ध नहीं था सिवाए घोड़ों और खच्चरों के अलावा। हमने भी काफ़ी घोड़े और खच्चर पास के गांव से किराए पर ले लिया था और गाँव में ही डॉ ज़ाकिर की टीम के सदस्य गाड़ियां लेकर हमारे लौटने का इंतज़ार कर रहे थे। पहाड़ी इलाकों पर यातायात का सबसे अच्छा साधन घोड़े और खच्चर ही होते हैं। 

एक दिन और बीत गया जो काफ़ी थकाने वाला था, हमने काफ़ी कुछ खोया लेकिन जो हमने पाया है ये हमारे ज़िंदगी के घावों पर मरहम लगाने के लिए काफ़ी है। 

अगली सुबह भी काफ़ी शोर गुल के साथ शुरू हुई, अपने टेंट से बाहर आने के बाद पता चला कि एक और रहस्यमयी मौत हो गई है, बिलकुल पहले साथी सुरेश की तरह ही जैकब की भी मौत हो गई थी, उसकी आँखें भी फट कर बाहर की ओर निकल आईं थीं और उसके चेहरे पर भी वैसे ही डर का भाव था। हम सबकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि इन दोनों की रहस्यमयी मौत के पीछे आखिर वजह क्या थी, सुरेश और जैकब के साथ चार और लोग थे जिन्होंने इस गुफा को ढूंढा था हो न हो उन बाकी बचे चार लोगों की ज़िन्दगी भी खतरे में थी। मैंने ये बात सोची और इसका ज़िक्र डॉ ज़ाकिर से अकेले में किया ताकि बाकी के टीम मेम्बर्स में अफरा तफरी ना मचे। डॉ ज़ाकिर भी इस बात से सहमत थे लेकिन एक दिन की खुदाई का काम और बाकी था इसलिए हम दोनों ने इस बात पर चुप रहने का ही फैसला किया हालांकि हम दोनों ने ये निर्णय लिया कि आज की रात हम दोनों ही इस रहस्य से पर्दा उठाएंगे कि आखिर इन दोनों मौतों के पीछे राज़ क्या है, इसके बाद हम दोनों ही गुफा की ओर खुदाई करने निकल गए। 

गुफा की खुदाई में प्राप्त आखरी सोने की मूर्ति निकाल कर उसके छः फुट खुदाई और की गई जब कुछ भी ना मिला तो हम सबको यकीन हो गया कि अब और कुछ नहीं मिलने वाला है। आज का दिन कल के हिसाब थोड़ा ज़्यादा थकाने वाला था। हम सभी टीम के सदस्यों ने आज रात आग के पास जश्न मनाया और रात को शराब भी पी क्यूँकि आज हम सबका काम यहां समाप्त हो गया था । हालांकि डॉ ज़ाकिर और मैंने खुद को होश में रखा है क्यूँकि रात को होने वाली अनहोनी से रूबरू होने का मन बना लिया था। रात को हम दोनों ही अपने अपने तंबुओं से आस पास के पहाड़ों पे और तंबुओं पर नज़र रखे हुए थे। बीच बीच में अपने तंबुओं की जालीदार खिड़की से टार्च जला बुझाकर एक दूसरे को इशारा भी कर दिया करते थे कि दोनों जगे हुए हैं। उस रात काफ़ी शीत लहर चल रही थी ऊपर पहाड़ों पर भी मौसम काफ़ी खराब था जिस वजह से कोहरे ने गहरी चादर सी चढ़ा दी थी।  

मैंने अपनी घड़ी में देखा तो सुबह के करीब एक बजा हुआ था। हम दोनों ने अपना ध्यान ज़्यादा तर रमेश और अक्रम के तम्बू पर केंद्रित कर रखा हुआ था क्यूँकि ये दोनों भी सुरेश की टीम के वह सदस्य थे जिन्होंने इस गुफा के अंदर सबसे पहले प्रवेश किया था। "    सुबह करीब दो बजे कुछ हलचल सी दिखाई दी थी रमेश और अक्रम के तम्बू में, एक चमकदार लाल रोशनी से तम्बू प्रकाश में डूब सा गया था, मैं और डॉ ज़ाकिर भागते हुए उस तम्बू तक पहुँचे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रमेश और अक्रम भी उसी तरह से चल बसे थे जैसे उनके बाकी के दो साथी गुज़र गए थे। डॉ. ज़ाकिर और मैं दोनों ही हैरान से खड़े होकर सोचते रह गए कि आखिर उस तेज़ लाल रोशनी का दिखाई देने का क्या मतलब हो सकता है। उसके जलते ही अचानक दो मौतें और हो गईं।

उसी दिन सुबह होते ही हम लोग उस रहस्यमयी गुफ़ा से कूच करने की तैयारी में जुट गए थे। सारा सामान सही तरीके से एकत्र कर के पास ही के गाँव की ओर जाने की तैयारी थी। पास का गाँव भी करीब तीन सौ किलोमीटर दूर था जहाँ पहुंचने में भी कई दिन लगते। रास्ते में रहस्यमयी तरीके से दो लोगों की मौत और हो गई, अब पास के गाँव वाले भी काफ़ी डरे हुए थे, उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था लेकिन मैंने और डॉक्टर ज़ाकिर ने अपनी छान बीन चालू रखी। जहाँ भी हमारी टीम पड़ाव डालती थी हमलोग रात में पेहरेदारी करने लगते पिछली दो रातों से हमसे चूक होती आयी लेकिन आज की रात हम दोनों अपनी आँखे खुली रखेंगे।

7:00 बजे हैं और इस समय टीम के सभी लोग चार अलग अलग दिशाओं में आग जला कर बैठे हुए हैं हंसी मज़ाक नाच गाना चल रहा है लेकिन शायद मैं और डॉक्टर ज़ाकिर ही इस बात की चिंता में हैं कि आज की रात क्या होगा किसकी बारी है?

रात का भोजन समाप्त करते ही डॉक्टर ज़ाकिर ने मुझे अपने तम्बू में इशारा कर के बुलाया, मैं उनके पीछे गया वहां उसी मृत अंग्रेज का ताबूत रखा हुआ था। डॉक्टर ज़ाकिर ने कहा कि "देखो मैंने आज इस ताबूत को अपने तम्बू में ही रखा है, मेरे एक गाँव के कर्मचारी ने कहा कि अगर ख़ज़ाने से पहले इसे पाया है तो शायद इसमें कोई अद्भुत शक्ति हो जिस वजह से ये हमें जमा हुआ मिला। मुझे उसकी बातों पर पहले यकीन तो नहीं था लेकिन जिस तरह के हालातों में हम लोग फंसे हुए हैं उनमें इस बात पर भी विश्वास करने का मन करता है"।

मैंने डॉक्टर ज़ाकिर से सहमत होते हुए सिर हिलाया उनके टेंट से बंदूक और गोलियां अपने ओवर कोट के जेब में भर ली। डॉक्टर ज़ाकिर भी ज़रूरत का सामान साथ लेकर निकल पड़े। पास के टीले पर चढ़ने से पहले टेंट के बाहर आग जला कर बैठे लोगों से कह दिया कि अन्दर सोने से पहले आग में लकड़ीयां और डाल देना ताकि काफ़ी देर तक आग चारों कोनों में जलती रहे इससे कोहरे के बादल भी थोड़ा कम होंगे और नज़र रखने में भी आसानी होगी।

फिर मैं और डॉक्टर ज़ाकिर पास के एक टीले पर चढ़ गए जहां से सभी पड़ाव पर नज़र रख सकते थे लेकिन उस रात सोने से पहले उन मज़दूरों ने लकड़ीयां आग में उतनी नहीं रखी जिस वजह से कुछ ही देर में कोहरे ने अपनी चादर चढ़ा ली। जिस वजह से कुछ घंटों बाद नज़र रखने में थोड़ी परेशानी होने लगी। मैंने डॉक्टर ज़ाकिर से कहा" तुम रूको मैं जाकर देख कर आता हूँ, आग कम होने लगी है लकड़ीयां भी डाल दूँगा।" 

डॉक्टर ज़ाकिर ने मेरी तरफ देख कर कहा" ठीक है लेकिन अपना ध्यान रखना मैं यहीं से तुम्हें कवर कर लूंगा अगर कुछ गड़बड़ हुई तो।" 

मैं कैंप की तरफ बढ़ने लगा मेरे पास थी Winchester 1886 in .50-110 Winchester राइफल और डॉक्टर ज़ाकिर के पास थी Sharps Model 1874 Creedmore जो काफी दूर से भी सटीक निशाना लगाने के लिए जानी जाती थी लेकिन फिर भी हम दोनों के मन में एक अनजान सा डर घर करने लगा था। इसलिए बड़ी होशियारी से मैं धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा। कैंप के एक कोने पर मैंने आग जला दी दूसरे कोने की तरफ बढ़ ही रहा था कि अचानक मुझे ऐसा लगा कि कोई हलचल सी हुई। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं था। फिर मैं दूसरे कोने में लकड़ियां डालने गया मैंने आग बढ़ा दी। अब तीसरे कोने की बारी थी कोहरा काफ़ी था मैं आहिस्ता आहिस्ता तीसरे कोने की तरफ़ बढ़ ही रहा था कि अचानक तेज़ लाल रोशनी चमकी और एक चीख़ सुनाई पड़ी। चीख इतनी भयानक थी कि किसी की भी दिल की धड़कन रुक जाती। डॉक्टर ज़ाकिर उस टीले से कूदकर कैंप की ओर भागते हुए आने लगे चुकीं मैं नज़दीक था मैंने उस ओर दौड़ लगाई जहाँ से तेज़ लाल रोशनी चमकी और चीख़ सुनाई पड़ी थी। मैं उस टेंट में पहुँचा लेकिन कुछ दिख नहीं रहा था सिर्फ अंधेरा था मैंने जेब से टार्च निकाल कर सब तरफ़ देखा कोई भी नहीं था लेकिन हमारे टीम के एक सदस्य की मौत हो गई थी। इतने में डॉक्टर ज़ाकिर भी पहुंचे और उनके बाद टीम के वो सदस्य जिनकी नींद उस भयानक चीख़ को सुनकर खुल गई थी। 

सुबह के तीन बजे हुए थे फ़िर हम सबमें से किसी ने सोना मुनासिब नहीं समझा। 

डॉक्टर ज़ाकिर ने मेरे पास आकर धीरे से कहा "मैंने उसे देखा जब मैं कैंप की तरफ भागते हुए आ रहा था लेकिन ये बात मैंने सबके सामने बताना मुनासिब नहीं समझा, जैसे ही तुम टेंट की तरफ पलट कर आए वो मेरे टेंट की तरफ़ जाने लगा उसके पैर जैसे ज़मीन पर नहीं हवा में थे और गज़ब की रफ्तार थी उसका दाहिना हाथ उसका सिर पकड़े हुए था। वो एक जीवित मुर्दा है जो शायद इस ख़ज़ाने की रखवाली कर रहा है। किसी तरह हमें उसे इस ख़ज़ाने से दूर करना ही होगा नहीं तो हमारे बरसों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। "  मैंने डॉक्टर ज़ाकिर की तरफ़ देखते हुए कहा "ये इतना आसान नहीं होगा, सबसे पहले तो हम लोगों को उसके बारे में सारी जानकारी मालूम करनी, तुम उसे ले तो आए हो अपनी रिसर्च के लिए लेकिन अब वो हम सब के लिए आफ़त बन गया है, मुझे लगता है सुबह होते ही इसका शरीर बेजान हो जाता है।"

डॉक्टर ज़ाकिर ने कहा " सबसे पहले तो एक रात मेरे टेंट के पीछे से हल्की रोशनी रख कर इस पर नज़र रखना पड़ेगा। "

मैंने अचंभित स्वरों में कहा" अब सिर्फ एक रात और उसके बाद इस टीम में हम दोनों का ही नंबर है, इस बात का ध्यान रखो। "

" अरे तुम परेशान मत हो मैं अपने उन साथियों को रात में गश्त करने के लिए लगा दूंगा जिनके पास बंदूकें हैं और हम दोनों मेरे टेंट के पीछे से इस पर नज़र रखेंगे" डॉक्टर ज़ाकिर ने विश्वास दिलाते हुए कहा। मैंने भी सहमति जताई।

अब रोशनी हो गई थी क्यूँकि सूरज ने एक लम्बी, थकान भरी और भयानक रात के बाद अपना मुँह दिखाया था।

हम लोग फ्रेश हुए और आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे। टीम के सदस्यों ने टेंटों को निकालना शुरू किया और घोड़ों पर समान लाद दिया गया क्यूँकि हम सभी को पहाड़ों और नदी के रास्तों को तय करना था जिसकी गहराई तो ज़्यादा न थी लेकिन पानी का बहाव ज़्यादा था। ऐसा झरने के कारण था जो कुछ ही दूरी पर था और नदी के दूसरे किनारे पर ही गाँव की ओर रास्ता जाता था। किसी तरह हम लोगों ने नदी पार की जिसमें एक घोड़े का नुकसान होते होते रह गया। मैंने उसे बड़ी कुशलता से बहने से बचा लिया आखिर इतने सालों से हमारे परिवार में अरबी घोड़ों का व्यापार होता आया था उन्हें बड़ी रेसों से लेकर हर बड़े लोगों को बेचा जाता था जो शौकीन हुआ करते थे। बस मैंने ही पढ़ाई लिखाई करके अपनी अलग पहचान बनाई और अगर आज की रात इस कूदरत के करिश्मे जैसी मौत का राज़ पूरी तरह से नहीं जाना और रोका तो वो पहचान भी मिट ही जाएगी।

रात हो गई है हम सबने शाम को ही पड़ाव डाल दिया था। सभी ने अपने टेंट इस तरह लगाए हैं कि एक गोलाई सी बन गई है और जिस टेंट में उस अंग्रेज़ी ऑफिसर का ताबूत है उसे थोड़ी दूरी पर लगाया है ताकि आग की रोशनी से बचा रहे। ऐसा करने का यही है कि हम लोग जो पीछे से उस ताबूत पर नज़र रखेंगे तो हमारी परछाई नहीं दिखेगी। लालटेन की रोशनी तो पहले ही धीमी कर दी गई थी। उस टेंट के पीछे झाड़ियां भी है तो हम दोनों को छुपने में सहायता मिलेगी। 

रात का खाना खत्म होते ही सबने फैसला किया कि कौन रात में पेहरा देगा। सबने तय किया कि जिनके पास हत्यार हो और उन्हें चलाने का अच्छी तरह अनुभव हो वही पेहरा देगा हमारे पास चार Colt M1911, 1911 गन और 

M1 Garand, 1936, Caliber .30, M1, की पाँच राइफ़लें थीं और पाँच लोगों को आज रात सामने से पेहरा देना था। मेरे और डॉक्टर ज़ाकिर के पास अपनी राइफलें थीं।  

मैं और डॉक्टर ज़ाकिर 12:00 बजे से पहले ही अपनी अपनी जगह छुप कर टेंट में किए गए छेद से झांकने लगे थे क्यूँकि कूदरत का ऐसा अजूबा कभी कभी देखने को मिलता है साथ ही हमारे दिलों में डर भी था कहीं पकड़े न जाएं और मरना पड़े। 

रात काफ़ी काली थी ऊपर से कोहरे ने भी चादर चढ़ा रखी थी। जंगल के जानवर भयानक आवाज़ें निकाल रहे थे जिनमें सबसे ज्यादा भेड़ियों के रोने की आवाज़ डराने वाली थी ऐसा लग रहा था जैसे वो हम पर ही रो रहे हों। जंगल में ज़्यादातर जंगली जानवरों का डर सताता है पर हमारे सामने तो उन जानवरों से भी बड़ी समस्या थी और बस कुछ ही देर में वह समस्या उठ खड़ी होने वाली थी।

कुछ ही देर में ताबूत खुलता है और उसके अंदर से अंग्रेज का अधगला सिर बाहर आता है जिसे उसका हाथ ऊपर निकलता है। उसकी आँखें खुली थीं और हल्की लाल रंग की रोशनी निकल रही थी ऐसा लग रहा था मानो बदन का सारा खून उसकी आँखों में आ गया हो। थोड़ी देर बाद उसका धड़ हवा में उठ खड़ा होता है और धीरे धीरे नीचे ज़मीन की तरफ़ आता है लेकिन उसका बूट ज़मीन को नहीं छूता है। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी। 

वो धीरे धीरे हवा में आगे बढ़ता है हम पर उसकी नज़र नहीं पड़ी थी। टेंट के बाहर निकलने से पहले पहले वह रुक जाता है, उसका सिर उसके हाथ में इधर-उधर घूम कर देखता है काफ़ी कड़ा पेहरा था। वह थोड़ी देर कुछ सोचता है फिर तुरंत बाहर निकल कर अपना सिर अपनी गर्दन पर लगाता है और तेज लाल रोशनी चमकती है। सामने के पेहरेदारों की आँखें चकाचौंध हो जाती हैं उन्हें दिखना बंद हो जाता है, जैसा तेज़ चमकदार रोशनी आंखों पर पड़ने से होता है और वह सीधा अपने शिकार के टेंट में घुस जाता है। वहाँ से भयानक चीख़ निकलती है और हमारी टीम का वो सदस्य उसके भयानक चेहरे को देखकर मर जाता है। मैं और डॉक्टर ज़ाकिर अब तक सामने आ चुके थे और उस टेंट के पास पहुंचने ही वाले थे कि वो बड़ी रफ्तार से अपने ताबूत में जाकर सो गया। उसने ऐसा गज़ब की तेज रफ्तार से किया। 

जिन लोगों के ऊपर उस अंग्रेज भूत ने तेज़ रोशनी चमकाई सब अन्धे हो गए लेकिन उसने अपना शिकार इतने लोगों के बीच में भी नहीं छोड़ा। उनमें से एक भी गोली या करतूस नहीं चला पाया। 

मैंने डॉक्टर ज़ाकिर से अकेले में कहा " मुझे इसकी एक कमज़ोरी मिल गई है और इसके लिए मेरे पास एक तरकीब भी है बस सुरज की रोशनी निकलने दो।"     


अपने उन पाँच टीम के सदस्यों को फ़र्स्ट ऐड देना पड़ा क्यूँकि उनकी आंखों से खून टपकने लगा था। उनकी आंखों पर अच्छी तरह से पट्टी बांधने के बाद डॉक्टर ज़ाकिर ने मुझे एक एकांत जगह पर ले जाकर पूछा "देखो अब कुछ ही देर में सूरज दिखने लगेगा तुम अपनी किसी योजना के बारे में बता रहे थे, क्या है वो ?"

मैंने उनसे कहा "अभी नहीं पहले सूरज निकल जाने दो फ़िर मैं बताऊंगा क्या करना है।"

कुछ ही देर में एक और खतरनाक रात के बाद बेसब्री से इंतजार करने के बाद सुरज ने अपना मुँह दिखाया। अब सबकी जान में थोड़ी जान आई थी। जब टीम के सभी सदस्य जाग गए तो उनमें से कुछ को ताबूत बाहर लाने को कहा। सूरज की रोशनी काफ़ी तेज थी मेरी बनाई हुई योजना के लिए बिलकुल सही था। मैंने अपने टीम के बाकी सदस्यों को हत्यार लेकर तैयार खड़े रहने को कहा अगर उस अंग्रेजी सिपाही ने कोई हरकत की तो उसे गोलियों से भून देने के लिए। 

उस ताबूत को बाहर लाकर सुरज की तेज रोशनी में खोलकर रखा गया। उसका रंग थोड़ा फीका पड़ गया मैंने उसके नज़दीक जाकर उसका सिर उठा लिया उसने कोई हरकत नहीं की क्यूँकि सूरज की रोशनी में वो बेजान था। उसका सिर मैंने एक कपड़े के बड़े पोटली नुमा बटुए में रख दिया। अब धड़ को उस संदूक बंद कर घोड़े पर लादने को कहा। सिर को मैंने एक छोटे संदूक में रख दिया और उसे एक अलग घोड़े पर लदवा दिया जिस पर कुछ मूर्तियां भी लदी हुई थीं । अब सबने अपने टेंट को समेटना शुरू कर दिया और चलने की तैयारी में जुट गए। सफर काफ़ी लम्बा और थका देने वाला था फिर भी हम लोग हार मानने वालों में से नहीं थे।

रास्ते में डॉक्टर ज़ाकिर अपने घोड़े को मेरे घोड़े के नज़दीक लाकर बोले "क्या तुमको यकीन है अब खतरा टल गया है, क्या होगा अगर आज की रात फ़िर वो जाग कर मेरा शिकार करेगा", उनके चेहरे पर चिंता के भाव थे।

मैंने उन्हें अश्वासन दिलाते हुए कहा "फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है अब सब कुछ हमारे कंट्रोल में है। दरअसल उसका सिर ही उसका सबसे शक्तिशाली हिस्सा था जो उसे रास्ता बताने से लेकर, सबको एक तरह की चुंबकीय लाल किरणों से अपने भयानक चेहरे को दिखा कर मारने का काम भी करता और उन्ही से लेज़र किरणों को निकाल अंधा भी कर देता था।अब उसका सिर भी उतना ताकतवर नहीं रह गया क्यूँकि उसे अपनी शक्ति को दिखाने के लिए अपने गर्दन से जोड़ना पड़ता था जिससे उसका भयानक रूप सामने आता था। अब ख़ज़ाना हक़ीक़त में हमारा हो गया है। "

डॉक्टर ज़ाकिर मुस्कुराने लगे और जेब से सिगार निकाले एक मुझे दिया और दूसरा ख़ुद जलाने के लिए मुँह में दबा लिया, फिर हम दोनों ने बड़े रौब से उसे जलाया। सिगार के कुछ कश लगाने के बाद उन्होंने मुझसे कहा " इसके धड़ को तो मैं अपनी कानपुर की बड़ी हवेली में अपने रिसर्च के लिए रख लूँगा लेकिन सिर का क्या होगा, उसके बारे में भी तो सोचना होगा।" 

"सिर को मैं अपने नैनीताल हाइवे वाले फ़ार्म हाउस में रख दूंगा। वहां उस फ़ार्म हाउस की देखभाल करने वाले का परिवार भी रहता है। तो वहां से इसके ग़ायब होने का कोई सवाल नहीं है क्यूँकि इसके गायब होने का मतलब है हम दोनों की मौत", मैंने भी सिगार पीते हुए बड़े आश्वस्त स्वरों में बोला। 

डॉक्टर ज़ाकिर ने कहा" चलो इस खतरे से तो मुक्ति मिली, अच्छा सुनो मैंने सोचा है कि ख़ज़ाने में एक बड़ा बक्सा भर कर हीरे निकले हैं जिनमें से अगर 100 - 100 हीरे भी दोनों आपस में बांट लेंगे तो हमारी आने वाली पाँच पीढ़ियाँ आराम से खाएगी। एक हीरे की कीमत आज की तारीख में 5 करोड़ रुपये है। आपस में बाँट लेने के बाद और टीम के सदस्यों को भी एक एक हिरा देने के बाद भी हमारे पास सरकार के ख़ज़ाने के लिए काफ़ी है। "

मैंने सहमत होकर सिर हिलाया और कहा" चार बज चुके हैं अब हमें एक शांत और अच्छी जगह देख कर वहाँ पड़ाव डाल देना चाहिए। कल शाम तक हमलोग गाँव में पहुंच जाएंगे। अब थोड़ा सुस्ता लेना चाहिए पिछले दो दिनों से इस अंग्रेज ऑफ़िसर ने आराम करने नहीं दिया था। "

डॉक्टर ज़ाकिर ने भी हाँ में हाँ मिलाकर टीम के सभी सदस्यों को पड़ाव डालने का निर्देश दिया। 

पड़ाव डालते ही मैं तो अपने टेंट में जाकर सो गया उस समय शाम के पांच बजे हुए थे, करीब दस बजे डॉक्टर ज़ाकिर मुझे ख़ुद जगाने आए और कहा" चलो अब खाने का समय हो गया है, जल्दी से हाँथ मुँह धो लो, हमारे लड़को ने आज एक हिरण का शिकार किया है, उसी का ताज़ा गोश्त आज के खाने का मेनू है।" 

मैं पास ही छोटी नदी में हाँथ मुँह धोकर आ गया, टीम के सभी सदस्य मिलकर हिरण पकाने और हंसी मज़ाक करने में जुटे हुए थे। 

मैंने डॉक्टर ज़ाकिर के नज़दीक बैठकर उनसे पूछा" उस अंग्रेज़ी ऑफिसर के अंगों के दोनों हिस्सों को अलग अलग टेंट में रखा है न, नहीं तो उसके धड़ को सिर मिल गया तो हम दोनों की ख़ैर नहीं।" 

"तुमने जैसा कहा था वैसा ही किया गया है उसका धड़ एक अलग टेंट में है और सिर के बक्से को अलग रखवा दिया है", डॉक्टर ज़ाकिर ने आश्वासन भरे शब्दों में कहा।                                      

                           To Be Continued...

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 डायरी-2


मैंने डॉक्टर ज़ाकिर की ओर देखते हुए कहा "वो सब तो ठीक है लेकिन आज की रात भी हम सबको थोड़ा सतर्क रहने की ज़रूरत है। ऐसा करो कि सिर वाला बक्सा मेरे टेंट में रखवा दें, मैं थोड़ी देर सो चुका हूँ तो उस अंग्रेज के कटे हुए सिर पर निगरानी आराम से रख सकता हूँ, हो सकता है आज की रात उसका धड़ अपने सिर को तलाश करे ऐसे में टीम के सदस्यों के सहारे उसे नहीं छोड़ सकते हैं, मान लो किसी की आँख लग ही तो उस अंग्रेज के धड़ को उसका ताकतवर सिर दुबारा मिल जाएगा।"

" मेरे ख्याल से तुम बिलकुल सही कह रहे हो, हम जोखिम नहीं ले सकते हैं, अभी अपने आदमियों से बोलकर सिर वाला बक्सा तुम्हारे टेंट में रखवा देता हूँ", डॉक्टर ज़ाकिर ने मुझसे सहमत होते हुए कहा और अपने दो आदमियों को बुलवाकर उस बक्से को मेरे टेंट में रखवा दिया। खाने का भी समय हो चला था बक्से को अपने टेंट में रखवाकर हम सब ही खाना खाने के लिए चले गए। खाने में लज़ीज़ हिरण का गोश्त बना था ।

खाना समाप्त होते ही मैं सीधा डॉक्टर ज़ाकिर के टेंट में चला गया। हमने काफ़ी देर तक बात की। उनके टेंट में बैठ कर हम दोनों हीरों को देख उसे अलग अलग रख रहे थे। जैसा डॉक्टर ज़ाकिर ने कहा था सौ सौ हीरे हम दोनों ने छांट कर अलग कर लिए जो अनोखे और अधिक कीमती थे। उन्हे कपड़े की एक पोटली नुमा छोटे बटुए में रखा और अपने टीम के सदस्यों की गिनती कर उनके लिए भी एक एक हीरा निकाल उसे अलग कपड़े के बटुए में रखा। रात काफ़ी हो गई थी मैंने डॉक्टर ज़ाकिर को शुभ रात्री कहा और अपने हिस्से के हीरों के साथ अपने टेंट में सोने चला गया।

उस अंग्रेज ऑफिसर के सिर वाला खतरनाक बक्सा भी वहीं रखा था। मैं टेंट में आकर थोड़ी देर के लिए लेट गया और सोचने लगा कि आज की रात चार लोग कैंप की पेहरेदारी कर रहे हैं हत्यारों के साथ अगर उनसे चूक हो गई और सिर अंग्रेज अधिकारी के हांथों लग गया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी, डॉक्टर ज़ाकिर का हीरा बांटना भी व्यर्थ हो जाएगा क्यूँकि सिर हाँथ लगते ही सबसे पहले उनका और बाद में मेरा शिकार हो जाएगा। सोचते ही सोचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला। 

"कम हियर...... वेयर आर यू गोइंग.... यू स्टुपिड....... कम हियर इन द नेम ऑफ क्वीन ", एक अनजान आवाज़ सी सुनाई पड़ी। 

मैंने अपनी आँखे खोली क्यूँकि नींद टूट जो गई थी फ़िर थोड़ी देर उस आवाज़ को दुबारा सुनने के लिए वहीं लेटा रहा। 

"आई कैन हियर द साउंड ऑफ योर फूट स्टेप ", एक बार फिर वो अनजान आवाज़ सुनाई पड़ती है। 

देखा तो उस अंग्रेज का सिर संदूक के अंदर से आवाज़ दे रहा था। उस संदूक के अन्दर तेज लाल रोशनी चमक रही थी जो कीहोल से साफ़ देखी जा सकती थी। मैंने अपने मन में सोचा इसे तो कपड़े के बड़े बटुए में रखा था फिर संदूक से इतनी तेज रोशनी कैसे चमक सकती है लगता है इसे किसी ने बटुए में से बाहर निकाल कर संदूक में ऐसे ही रख कर बंद कर दिया है लेकिन इसकी चाबी तो मेरे पास है। खैर ये समय इन सब बातों को सोचने का नहीं था। मैंने अपने बगल में रखी राइफल उठाई और टेंट के द्वार को निशाने पर रख कर बैठ गया। अगर इसका धड़ सामने से आता तो ख़ातिरदारी के लिए तैयार था।

"टुम कहाँ पे है...... आई एम वेटिंग..... इन द नेम ऑफ क्वीन कम क्विक.... आज डॉक्टर का बारी है..... ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़ज़ाने को कोई नहीं ले जाने को सकटा है...... इन द नेम ऑफ क्वीन कम फास्ट..... कहाँ मर गया टुम", संदूक के अंदर से अंग्रेज अधिकारी आवाज़ लगाता है लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। शायद इसका धड़ न देख पाने की वजह से भटक गया था और सिर संदूक के अंदर से पुकार रहा था। एक बार पुकारने के बाद वो थोड़ी देर के लिए खामोश हो जाता था और अपने शरीर के बाकी हिस्से के आने का इंतजार करता था। मेरे अंदर भी डर की लहर सी दौड़ गई थी। फिर भी मैंने अपने अंदर थोड़ा साहस जुटा रखा था, हांथों में राइफल जो थी। 

उस अंग्रेज अधिकारी ने एक बार और आवाज़ लगाई "अरे टुम किधर रह गया उल्लू का डुम...... इन द नेम ऑफ क्वीन जब सन निकलेंगा टब आएगा क्या...... कम सून यू फ़ूल।" 

एक तो उसकी आवाज़ भारी थी और ऊपर वो गरज रहा था। मैंने सोचा कि अगर इसकी आवाज़ सुनकर इसका धड़ बाहर निकल कर आ गया तो मुसीबत बढ़ सकती है। मेरे दिमाग में एक योजना आई, मैंने उसे आवाज़ लगाई " कौन है," फिर अपने स्वर को थोड़ा धीमा कर के कहा " क्यूँ इतनी रात में शोर मचा के रखा है, कोई नहीं आने वाला है तुम्हारी मदद के लिए।" 

"ओ! डॉक्टर का साथी प्रोफेसर बोलटा है.... टुम भी नहीं बचेंगा यू ब्लडी थीफ़ एक बार हमारा धड़ को आने दो...... इन द नेम ऑफ क्वीन टुम्हारा एक भी आदमी को ज़िंदा नहीं छोड़ेंगा", अंग्रेज अधिकारी ने गुस्से में कहा लेकिन अब उसके निकलते हुए अल्फाज़ों पर इतना ज़ोर नहीं लग रहा था जिससे आवाज़ और बातें बाहर आसानी से नहीं सुने जा सकते थे। मेरी योजना काम करने लगी थी वो भी मेरे सवालों का जवाब दे रहा था और बातों में उलझ गया था। 

मैंने उससे पूछा " आप कौन हैं माई लॉर्ड", उस संदूक की तरफ़ देखते हुए। 

"हम कमांडर ब्राड शॉ राउडी है", उस अंग्रेज अधिकारी ने मेरे सवाल का जवाब दिया।

मैंने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा "इंडिया अब आज़ाद हो चुका है कमांडर साहब और अब ये ख़ज़ाना भारत सरकार की विरासत है"।

"इंडिया आज़ाद हो गया इससे क्या ये ख़ज़ाना कमांडर ब्राड शॉ राउडी का निगरानी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का हाई कमांड द्वारा दिया गया है और ब्राड शॉ है तो इस ख़ज़ाने को कोई नहीं ले जाने को सकटा है, इन द नेम ऑफ क्वीन ", कमांडर ने जवाब दिया उसकी आवाज़ में काफ़ी क्रोध भरा था लेकिन साथ ही साथ उस आवाज़ में काफ़ी आत्मविश्वास भरा हुआ था। 

मेरे मन में उस ख़ज़ाने के बारे में विस्तार से जानने की बड़ी उत्सुकता हुई तो मैंने उससे सारी बातें शुरू से बताने को कहा क्यूँकि यह जानना बहुत जरूरी था कि वह इस ख़ज़ाने से कैसे जुड़ा और ख़ज़ाना शहर या गाँव को छोड़ इतनी दूर सुनसान पहाड़ों की गुफा में क्या कर रहा था, ये एक पहेली थी जिसका जवाब केवल कमांडर ही दे सकता था। 


कमांडर ने सब बताना शुरू किया "एक दौर ऐसा भी था कि ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्ज़े में एशिया का टमाम देश था। इस कंपनी का पास सिंगापुर और पेनांग जैसा बड़ा बड़ा बंदरगाह था। ये ब्रिटेन में रोज़गार देने का सबसे बड़ा ज़रिया था। 

भारत में इस कंपनी का पास ढाई लाख से ज़्यादा लोगों का फौज था। ये सिर्फ़ इंग्लैंड ही नहीं, यूरोप का तमाम देशों का लोगों का ज़िंदगियों में दखल रखटा था। लोग चाय पीता था तो ईस्ट इंडिया कंपनी का, और कपड़े पहनता था तो ईस्ट इंडिया कंपनी का, इन द नेम ऑफ क्वीन"। 

कमांडर ने आगे जारी रखा " 1498 में परतगेज़ी मुहिम जो वास्कोडिगामा ने अफ़्रीका का दक्षिणी कोने से रास्ते ढूंढ कर भारत को समुद्री रास्ते का ज़रिए यूरोप से जोड़ दिया था।आने वाले दशकों का दौरान धौंस, धमकी और दंगा-फ़साद का इस्तेमाल करके परतगेज़ी बहरे-ए-हिन्द का तमाम व्यापारों पर क़ाबिज़ हो गए और देखते ही देखते पुर्तगाल का क़िस्मत का सूरज आधे आसमान पर जगमगाने लगा।

इनका देखा-देखी डच अपने तोप वाहक नौसेना जहाज़ लेकर बहर-ए-हिन्द में आ धमका और दोनों देशों के बीच लड़ाई-झगड़ा होने लगा।

जब पुर्तगालियों ने भारत का इतिहास पलट कर रख दिया। 

इंग्लिस्तान ये सारा खेल बड़े ग़ौर से देख रहा था, भला वो इस दौड़ में क्यों पीछे रह जाता? इसलिए महारानी एलिज़ाबेथ ने इन दो देशों का नक़्शे-क़दम पर चलते हुए दिसम्बर 1600 में ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित करवा कर इसे एशिया का देशों का साथ पूर्ण स्वामित्व के साथ व्यापार का इजाज़त-नामा कर दिया।

लेकिन अंग्रेज़ों ने एक काम किया जो हमसे पहले आने वाला दोनों यूरोपीय देशों से नहीं हो सकता था। उन्होंने सिर्फ़ युद्ध का व्यापार पर सारी उर्जा खर्च नहीं किया बल्कि दूतावास का काम पर भरपूर ध्यान दिया। यही वजह था कि अंग्रेजों ने थॉमस रो जैसा मंझे हुए राजदूत को भारत भेजा ताकि वो ईस्ट इंडिया कम्पनी का वास्ते बंद दरवाज़ा खोल दे। 

अंग्रेजों का ईस्ट इंडिया कंपनी का स्थापना 31 दिसंबर 1600 का दिन एक शाही आदेशपत्र (रॉयल चार्टर) का द्वारा लंदन का उन सौदागरों का एक संयुक्त स्टॉक कंपनी का रूप में हुआ था जो पूरब के व्यापार में डचों का प्रतियोगिता का मुकाबला करने के लिए एक हुआ था। इस कंपनी को पूरब का साथ इंग्लैंड का समस्त व्यापार का एकाधिकार दे दिया गया और वणिकवादी विचारों का वर्चस्व वाला उस काल में भी अपने व्यापार का खर्च उठाने के लिए कीमती धातुओं (Bullion) को देश से बाहर ले जाने का अनुमति दे दिया गया ।

कंपनी ने औपचारिक रूप से भारत में अपना व्यापार 1613 में आरंभ किया जबकि वह अपने से पहले रंगमंच पर आए पुर्तगालियों का साथ हिसाब बराबर कर चुका था। 

मुगल बादशाह जहाँगीर का एक फरमान ने उसे भारत में अपना फैक्टरियाँ (गोदाम) बनाने का अनुमति दिया और पहला फैक्टरी पश्चिमी तट पर सूरत में बनाया गया। 1617 में जहाँगीर ने अपना दरबार में अंग्रेजों के आवासी दूत का रूप में सर थॉमस रो का स्वागत किया।

यही वह विनम्र प्रारंभ था जिसका बाद कंपनी ने धीरे-धीरे अपना व्यापारिक कार्यकलापों को भारत का दूसरा भागो में फैलाया और बंबई कलकत्ता और मद्रास सत्रहवीं सदी का अंत तक उसके कार्यकलापो का तीन प्रमुख केंद्र बन चुका था, इन द नेम ऑफ क्वीन हम बताते बताते आगे का भी बता दिया। "

" ख़ैर हुआ ये कि बादशाह का सालगिरह था और मुग़ल रिवायत का मुताबिक़ उन्हें तौला जाना था। इस मौक़े पर ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो भी दरबार में मौजूद था। 

समारोह पानी में घिरा एक चौकोर चबूतरे पर आयोजित किया जा रहा था चबूतरे का बीचों-बीच एक विशालकाय सोने का पन्नी चढ़ा तराज़ू स्थापित था । एक पलड़ा में कई रेशमी थैले रखे हुए थे, दूसरे में खुद चौथे मुग़ल शहंशाह नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर सावधानी से सवार हुआ। 

भारी लबादों, ताज और सोने और आभूषण समेत शहंशाह जहांगीर का वज़न तक़रीबन ढ़ाई सौ पाउंड निकला।एक पलड़ा में ज़िल्ले-इलाही बैठा था, दूसरे में रखा रेशमी थैले बारी बारी तब्दील किया जाता था । पहले मुग़ल बादशाह को चांदी का सिक्कों से तौला गया, फिर तुरंत ही गरीबों में बांट दिया गया। इसके बाद सोने का बारी आया, फिर आभूषण, बाद में रेशम और आख़िर में दूसरा बेश-क़िमती चीज़ों से बादशाह सलामत का वज़न का तुलना किया गया ।

ये वो दृश्य था जो आज से तक़रीबन ठीक तीन सौ साल पहले मुग़ल शहंशाह नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर का दरबार में ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो ने देखा और डायरी में नोट कर लिया। लेकिन दौलत का इस हैरत कर देने वाला प्रदर्शन ने सर थॉमस को शक में डाल दिया कि क्या बंद थैले वाक़ई हीरे-जवाहारात या सोने से भरे हुए हैं, कहीं इनमें पत्थर तो नहीं," कमांडर बोलते बोलते थोड़ी देर के लिए खामोश सा हो गया।

" आगे क्या हुआ", मैंने उत्सुकता से पूछा।

"वैसा तो सर थॉमस रो का अच्छा दोस्ती था बादशाह से लेकिन ब्रिटिश के साथ व्यापार करने से कतराता था उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इंगलिस्तान एक छोटा सा अप्रत्याशित द्वीप था और बादशाह उसका साथ व्यापार करना अपना शान के ख़िलाफ़ समझता था। बादशाह किसी न किसी बहाने इंगलिस्तान को ये एहसास दिलाता रहता था कि वह एक छोटा सा द्वीप था सर थॉमस रो ने अपना डायरी में ये सारा बात लिख कर रखा था। लेकिन सर थॉमस रो ने हार नहीं माना वो बादशाह को इस बात का एहसास दिलाता रहता था कि वह सही है लेकिन व्यापार के लिए और उन्नति के लिए फैक्ट्रीयां (गोदाम) का बनना बहुत जरूरी है, इन द नेम ऑफ क्वीन ", कमांडर ने आगे बताया।

" बादशाह का इंगलिस्तान के साथ व्यापार न करने का वजह ये भी था कि मुग़ल शहंशाह पूरी दुनिया में सिर्फ़ ईरान के सफ़वी बादशाह और उसमानी ख़लीफ़ा को अपना प्रतिद्वंद्वी समझते थे। इसका किसी मामूली बादशाह के साथ बराबरी का स्तर पर समझौता करना उसका शान के ख़िलाफ़ था। सर थॉमस रो ने तीन साल का कड़ा मेहनत, राजनयिक दांव-पेंच और तोहफ़े देकर जहांगीर से तो नहीं, लेकिन वली अहद शाहजहां से आज से ठीक तीन सौ साल पहले अगस्त 1618 में एक समझौते पर हस्ताक्षर करवाने में कामयाब रहा, जिसके तहत इस कम्पनी को सूरत में खुलकर कारोबार करने का इजाज़त मिल गया। लेकिन उससे पहले काफ़ी मेहनत करना पड़ा, सर थॉमस रो ने अपना डायरी में यह भी लिखा एक ओर जनता ग़रीब और बेरोजगार है दूसरी तरफ बादशाह आलीशान जीवन बिता रहा है यहाँ के हिन्दू राजा महाराजा का कहना है कि सारा दौलत उनसे लूटा गया। बादशाह और उनका पूर्वज ने हिन्दू राजा महाराजा का पूर्वज का ख़ज़ाना लगभग खाली कर दिया है। हर चीज़ में टैक्स लेता है यहाँ तक की उसका holy place का ऊपर भी टैक्स है। थॉमस रो का डायरी से और उसका रिपोर्ट से हिन्दुस्तान का सारा हाल हम लोगों को इंगलिस्तान में मिला। फिर भी हम सबने उनका राजनीतिक मुद्दा पर बोलना सही नहीं समझा। कंपनी का व्यापार करने से हिन्दुस्तान के लोगों का आर्थिक स्थिति सुधरा उनको रोज़गार मिलना शुरू हुआ। फैक्ट्री और गोदामों में उनको बतौर कर्मचारी रखा गया। हिन्दुस्तान का लोग काफ़ी ख़ुश था उनका अन्दर अनुशासित ढंग से जीने का तरीका आ गया। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी का तरक्की और हिंदुस्तान के लोगों का ख़ुश हाल जीवन ख़ुद यहाँ बादशाह के लोगों से बर्दाश्त नहीं हुआ। यह वह लोग था जो ख़ुद बादशाह का तख्ता पलट कर देना चाहता था। 

1623 में खुर्रम ने विद्रोह कर दिया। क्योंकि नूरजहाँ अपना दामाद नगरयार को वली अहद बनाने की कोशिश कर रहा था। अंत में 1627 को बाप और बेटे में सुलह हो गया ।

जहाँगीर का कई बार शादी हुआ। उनका सबसे मशहूर पत्नी नूरजहाँ था। जोकि एक बागी अधिकारी शेर अफ़ग़ान की विधवा था।

जहाँगीर का मृत्यु बीमारी के कारण 7 नवम्बर, 1627 को हुआ था। उनका मृत्यु के समय वो कश्मीर से लाहौर जा रहा था। जहाँगीर का तिसरा पुत्र सबसे सफल रहा था जिसका नाम खुर्रम था। शाहजहाँ के ही बचपन का नाम खुर्रम था। 

24 फरवरी 1928 को जहाँगीर का मृत्यु के बाद शाहजहाँ तख्त पर बैठा। शुरुआत का तीन साल बुंदेल का जुझार सिंह और अफ़गान सरदार खानेजहाँ लोदी का विद्रोह दबाने में गुज़र गया। 

शाहजहाँ का मुकाबला सिक्खों का छठा गुरु हर गोविंद सिंह से भी हुआ , जिसमें सिक्ख सेना हार गया था। 

शाह जहाँ का शादी असफ खां का बेटी अर्जुमन बानू बेगम से हुआ था।जिसका बाद में नाम मुमताज़ महल रखा गया। 

1633 में शाहजहाँ ने दक्षिण भारत का 

अहमद नगर पर आक्रमण किया और उसे मुग़ल साम्राज्य का हिस्सा बनाया। इसका कुछ साल बाद 1636 में गोलकुण्डा पर आक्रमण किया जहाँ का तत्कालीन सुल्तान अब्दुल्ला शाह को हार का सामना करना पड़ा।

अब्दुल्ला शाह ने मुगलों का अधीनता स्वीकार किया। इसी दौरान अब्दुल्ला शाह के वज़ीर मीर जुमला ने शाहजहाँ को बेशकीमती हीरा कोहिनूर भेंट स्वरूप दिया," कमांडर बता ही रहा था कि कोहिनूर का नाम सुनते ही मैं रुक न पाया।

उसे कहानी के बीचोंबीच ही टोक दिया " कोहिनूर हीरा क्या हुआ उसका, ज़रा आगे बताओ ", मैंने बड़ी उत्सुकता दिखाते हुए पूछा।

" क्यूँ प्रोफेसर कोहिनूर का नाम सुनते ही तुम्हारा आँख गोल गोल हो गया ", कमांडर ने व्यंग्य कसा। 

"शाहजहां ने अपने लिए एक विशेष सिंहासन बनवाया। इस सिंहासन को बनाने में सैयद गिलानी नाम के शिल्पकार और उसका कारीगरों का टीम को कोई सात साल लगा। इस सिंहासन में कई किलो सोना मढ़ा गया, इसे अनेकानेक जवाहरातों से सजाया गया।

इस सिंहासन का नाम रखा गया तख्त—ए—मुरस्सा। बाद में यह 'मयूर सिंहासन' का नाम से जाना जाने लगा। बाबर के हीरे को भी इसमें मढ़ दिया गया। दुनिया भर के जौहरी इस सिंहासन को देखने आते थे। 

इन में से एक था वेनिस शहर का होर्टेंसो बोर्जिया। बादशाह औरंगजेब ने हीरे का चमक बढ़ाने के लिए इसे बोर्जिया को दिया। बोर्जिया ने इतने फूहड़पन से काम किया कि उसने हीरे का टुकड़ा टुकड़ा कर दिया। यह 793 कैरट का जगह महज 186 कैरट का रह गया। खैर ये तो बाद का बात है सबसे ज़रूरी तो यह है कि कैसे औरंगजेब ने शाहजहाँ को बन्दी बनाया और कैसे ये हीरा और तुमको मिला ख़ज़ाना अंग्रेजी हुकूमत के पास आया, इन द नेम ऑफ क्वीन, अब बाकी का कहानी हम कल बताएगा, सुबह होने वाला है अब हमारा आराम का समय है, तुम लोग आज का रात तो बच गया... ब्लडी इडियट हमारा बॉडी कहाँ रह गया.... कल फिर मिलेगा हो सकता है हमारा बॉडी कल हमको ढूंढ ले ", कमांडर ने बड़ी उम्मीदों के साथ कहा और खामोश हो गया।

जैसे ही कमांडर खामोश हो गया मैं समझ गया कि सो गया अब कोई खतरा नहीं था रात भर कहानी सुनने के बाद मैं भी थक गया था इसलिए सो गया।

"जागो अरे भाई जागो, सुबह हो गई है, अरे भाई प्रोफेसर सुबह हो गई", मैंने आँखें खोला तो देखा डॉक्टर ज़ाकिर सामने खड़े आवाज़ दे रहे थे।

डॉक्टर ने फिर कहा "अरे आज सुबह 12:00 जानते हो क्या हुआ"। 

मैंने पूछा "क्या हुआ था", अपनी आँखों को मलते हुए जैसा अक्सर ज़्यादातर लोग नींद से जाग कर करते हैं। 

" कल उस अंग्रेज अधिकारी का धड़ टेंट से बाहर निकल कर गश्त लगा रहा था, उसे कुछ दिखाई नहीं देने की वजह 

हताश सा कैंप के बाहर इधर-उधर टहल रहा था, कल रात पेहरे पर लगे एक आदमी ने मुझे उठाया फिर सारी बातें बताईं, टेंट से बाहर निकल कर देखा तो महाशय उन्ही पेहरेदारों के साथ बैठे हुए थे। वो सभी आराम से बातें कर रहे थे लेकिन उन्हें सुनाई नहीं देने से कोई दुर्घटना नहीं हुई। तुमने ठीक ही कहा था उस ज़िन्दा लाश की सारी ताकत उसके सिर में है", डॉक्टर ज़ाकिर ने मेरे कंधों पर को पकड़ कर मेरी ओर देखते हुए कहा।

मैं भी कुछ पलों के लिए मुस्कुराने लगा फिर कहा " चलो अच्छा है खतरा तो टला"। 

" कल तुम्हारे साथ क्या हुआ, आखिर तुम उसके सबसे खतरनाक अंग के साथ थे ", डॉक्टर ज़ाकिर ने मेरी तरफ़ बड़ी उत्सुकता से देखते हुए पूछा। 

"ज़्यादा कुछ तो नहीं हुआ बस मेरी नींद टूट गई देखा तो उस संदूक के चाभी लगाने वाली जगह से लाल रोशनी निकल रही थी अब संदूक में अलग से ताला तो लगता नहीं है। वो विशेष रूप से ख़ज़ाने या कीमती गहनों के लिए बना था और अंग्रेज अधिकारी का सिर अपनी बॉडी को आवाज़ लगा रहा था। वह काफी गुस्से में था लेकिन हम इंसानों की आवाज़ सुन पाने में असमर्थ था ", मैंने डॉक्टर ज़ाकिर से झूठ इसलिए कहा क्यूँकि मुझे उसका पता लगाना था जिसने कमांडर का सिर को संदूक खोलकर उसे कपड़े के थैले से बाहर निकाल कर संदूक में ऐसे ही रख दिया था। तभी तो रोशनी इतनी तेज चमक रही थी और उसकी आवाज़ बिना दबे सुनाई पड़ रही थी, अमूमन तौर पर जब किसी के ऊपर मोटे कपड़े के थैले , झोले या चादर से ढक देते हैं तो आवाज़ दबी हुई सुनाई पड़ती है । 

हालांकि डॉक्टर ज़ाकिर मेरे शक़ के दायरे से बाहर ही थे और मैं उन्हें अच्छे से जानता हूँ, वो मेरे अच्छे दोस्त भी हैं और अगर उन्हें धोखा देना ही होता तो मेरे हिस्से के हीरे पहले से ना देते, उन पर शक़ करना ही बेकार था। 

"अच्छा अब फ्रेश होकर कुछ खा पी लो, हमलोग 11:00 बजे तक निकलेंगे तो पहाड़ी पार करके आज शाम 6:00 बजे तक गाँव पहुँच जाएँगे। आज रात वहीं रुक कर कल सुबह गाड़ियों में पहाड़ों से नीचे उतर कर हाई वे का रास्ता पकड़ लेंगे, मैंने गाँव में रुकने का इंतज़ाम पहले ही कर लिया था, उसी मुखिया के खाली पड़े बंगलों में रुकेंगे जिसमें चढ़ाई चढ़ने से पहले रुके थे", डॉक्टर ज़ाकिर ने मुझसे कहा और टेंट से बाहर चले गए।

मैंने उनके जाते ही उस संदूक को खोला तो देखा कि मेरा शक़ सही था कमांडर का सिर बिना कपड़े के थैले सहित ऐसे ही रखा हुआ था। फिर मैंने उस संदूक को बंद कर दिया और हीरे के बटुए को देखा तो सब कुछ ठीक था। उन हीरों को अपने कपड़ों वाले सूटकेस में रख ताला मार दिया। फ्रेश होने के लिए टेंट से बाहर निकल गया। टीम के सदस्य नाश्ता बना रहे थे। मैंने टेंट के बाहर बाल्टी में रखे पानी से हाथ मुँह धोया और टीम के एक सदस्य को आवाज़ लगाकर नाश्ता अंदर ही भेजने को कहा। नाश्ते के बाद सारा सामान घोड़ों पर लदवा दिया। 

सब कुछ समेटने के बाद हमलोग सफ़र की शुरुआत करने के लिए तैयार थे। आज घोड़ों के साथ ऊँची और खतरनाक पहाड़ी चढ़ना था। हालाँकि पहाड़ी ज़्यादा ऊंची नहीं थी लेकिन पत्थरिली होने की वजह से घोड़ों के साथ काफी दिक्कत होती है, खासकर तब जब आपके साथ ज़्यादा वजनदार सामान हों और हमारे पास तो कई घोड़ों पर ख़ज़ाने के बक्से तथा झोले लदे हुए थे।

पहाड़ी आने से पहले ही डॉक्टर ज़ाकिर मेरे पास आकर बोले "प्रोफेसर तुम एक मंझे हुए घुड़सवार हो तो पहाड़ी पर अपने घोड़ों सहित पहले तुम्हें ही चढ़ना पड़ेगा फ़िर पहाड़ी पर रुक कर पीछे आ रहे घोड़ों को बड़ी सावधानी के साथ उन्हें चढ़ाई पर चढ़ाना पड़ेगा, एक बार चढ़ गए तो फिर नीचे उतरने में उतनी दिक्कत नहीं होगी"। 

मैंने डॉक्टर से कहा " परेशान ना हों मैं उन्हें आराम से चढ़ा लूंगा पहाड़ी पर "। 

पहाड़ी आते ही मैं अपने घोड़ों के साथ दल की अगुवाई करने के लिए आगे चलने लगा, मैंने बड़ी सावधानी से पहले अपने घोड़ों को चढ़ाया फिर रुक कर दल के सभी सदस्यों के घोड़ों को ऊपर चढ़ाया, मैं दल के सदस्यों को दिशा निर्देश देता जा रहा था कि कैसे उन्हें लगाम सही ढंग से थामना है, एक एक करके सभी घोड़ों को पहाड़ी चढ़ा कर फिर उन्हें बड़ी सावधानी से नीचे उतार लिया। घोड़े बड़े होशियार जानवर होते हैं अगर घुड़सवार अच्छा हो तो उनसे बहुत कुछ करवा सकता है। पहाड़ों पर घोड़े वज़न लाद कर भी बड़े अच्छे से चढ़ाई चढ़ लेते हैं बस उन्हें सही दिशा निर्देश देने वाला चाहिए। 

गाँव पहुंचते ही हम सभी सीधा मुखिया के बंगलों में चले गए, मुखिया के पास गाँव में तीन आवास थे, एक में वो खुद रहता था और बाकी दोनों बंगलों में यात्रियों के रहने का इंतज़ाम कर रखा था। अब अक्सर तो यात्री आते नहीं थे लेकिन फिर भी इन्हीं बंगलों से उसकी अच्छी कमाई हो जाती थी। यात्रियों के खाने पीने का इंतज़ाम भी था जो मुखिया अपने परिवार की महिलाओं से बनवा लेता था। मज़े की बात यह थी कि मुखिया जी ने चार शादियां कर रखी थीं लेकिन बिना लड़े सारी महिलाएँ एक साथ रहती थीं। बंगले पर पहुंचते ही डॉक्टर ज़ाकिर और मैंने अपने कमरों में सावधानी से अपना अपना सामान रखवा दिया। काफ़ी थक चुके थे इसलिए आराम भी करना ज़रूरी था इसलिए थोड़ी देर कमर सीधी करने के लिए बिस्तर पर लेट गए। 

कमांडर का सिर वाला संदूक मैंने टेबल पर रखवा दिया था और धड़ का ताबूत अलग कमरे में था जो डॉक्टर के ठीक सामने वाला कमरा था। दल के सदस्यों ने भी अपने कमरों में थोड़ा आराम कर लिया। 

करीब नौ बजे मुखिया ने खाने का इंतज़ाम करवा दिया, बहुत दिनों के बाद घर का खाना नसीब हुआ था और काफ़ी स्वादिष्ट बना था। खाने के बाद हम सब अपने अपने कमरों में चले गए। 

मैंने पेट भर कर खाया और कमरे में जाते ही बिस्तर पर लेट गया। थकान की वजह से मुझे नींद आ गई। 

"कहाँ रह गया टुम..... आज का रात डॉक्टर का टमाम करना है..... इन द नेम ऑफ क्वीन अब तो आ जा नहीं तो सुबह हो जाएगा", कमांडर ने अपने धड़ को फिर से आवाज़ लगाई।

मैं कमांडर की आवाज़ सुन कर जाग गया। एक ग्लास पानी पीने के बाद मैंने उससे कहा "आ गए मी लॉर्ड, अब आगे की कहानी तो सुना दीजिए सरकार"।


"ओ! प्रोफेसर कहानी सुनना है, ब्रिटिश गवर्नमेंट का ख़ज़ाना चुरा लिया डॉक्टर के साथ मिलकर, अब कहानी सुनकर कोहिनूर पर हाँथ साफ़ करना चाहता है, सुना है तुम्हारा इस टीम में एक धोखेबाज भी है पर तुमको उसका परवाह नहीं है ", कमांडर ने मुझसे पूछा।


" अरे उसका तो पता मैं लगा लूँगा आप तो बस कहानी सुनाओ", मैंने कमांडर से कहा।


" ठीक है, बताता है सुनो, अर्जुमंद का पैदाइश था 27 अप्रैल, 1593 का था। बेइन्तहा खूबसूरत था वो। बला का हसीना। कहते हैं शाहजहां ने पहला बार अर्जुमंद को आगरा का मीना बाज़ार का किसी गली में देखा था। उसका अनहद खूबसूरती देख शाहजहां को पहला नज़र में उससे प्यार हो गया। 


शाहजहां और अर्जुमंद का शादी में कोई दीवार नहीं था इसलिए 14 साल का अर्जुमंद और 15 साल का खुर्रम (शाहजहां का शुरुआती नाम) का सगाई हो गया, यह साल 1607 का बात है ।


फिर 10 मई, 1612 को सगाई का करीब पांच साल और तीन महीना बाद इन दोनों का निकाह हुआ। निकाह के समय शाहजहां का उम्र 20 बरस और तीन महीने था। अर्जुमंद था 19 साल और एक महीने का। उस ज़माने का बच्चा बच्चा लोगों को उन दोनों का कहानी मालूम था। शाहजहाँ को एक आशिक का रूप में भी जाना जाता था और ताजमहल इस बात का सबूत है।


अर्जुमंद और खुर्रम की जब सगाई हुआ था, तब खुर्रम का एक भी शादी नहीं हुया था। मगर सगाई और शादी के बीच खुर्रम का एक शादी फारस का शहजादी क्वानदरी बेगम से हो गया। वो सियासी कारणों से करवाया गया रिश्ता था। अर्जुमंद से निकाह के बाद भी उसने एक और निकाह किया। अपना तीन बीवियों में सबसे ज्यादा मुहब्बत शाहजहां अर्जुमंद बानो बेगम से करता था। अर्जुमंद यानी मुमताज का बुआ था मेहरुन्निसा। जिनकी शादी शाहजहां के पिता जहांगीर से हुआ और आगे चलकर इनका नाम ‘नूरजहां’ मशहूर हुआ। 


मुमताज और शाहजहां का बीच इतना मुहब्बत था कि लोग कहते हैं शौहर और बीवी में ऐसा इश्क़ किसी ने देखा नहीं था. दोनों का 13 बच्चे हुआ। तीसरे नंबर का औलाद था दारा शिकोह। और छठे नंबर पर पैदा हुआ था औरंगजेब। 1631 का साल था और महीना था जून. शाहजहां अपना सेना के साथ बुरहानपुर में था। जहान लोदी पर चढ़ाई था। मुमताज भी था शाहजहां के साथ। यहीं पर करीब 30 घंटे लंबे लेबर पेन के बाद अपना 14वें बच्चे को जन्म देते हुए मुमताज का मौत हो गया। मुमताज के डॉक्टर वज़ीर खान और उनके साथ रहने वाला दासी सति-उन-निसा ने बहुत कोशिश किया लेकिन वो मुमताज को बचा नहीं पाया। 


मुमताज का मौत के ग़म में शाहजहां ने अपने पूरे साम्राज्य में शोक का ऐलान कर दिया। पूरे मुगल साम्राज्य में दो साल तक मुमताज के मौत का ग़म मनाया गया था। कहते हैं कि मुमताज जब आगरा में होता था , तो यमुना किनारे के एक बाग में अक्सर जाया करता था। शायद इसी वजह से शाहजहां ने जब मुमताज का याद में एक मास्टरपीस इमारत बनाने का सोचा, तो यमुना का किनारा तय किया।


38-39 बरस का उम्र तक मुमताज तकरीबन हर साल गर्भवती रहा। शाहजहांनामा में मुमताज के बच्चों का ज़िक्र है। 

1. मार्च 1613: शहजादी हुरल-अ-निसा

2. अप्रैल 1614: शहजादी जहांआरा

3. मार्च 1615: दारा शिकोह

4. जुलाई 1616: शाह शूजा

5. सितंबर 1617: शहजादी रोशनआरा

6. नवंबर 1618: औरंगजेब

7. दिसंबर 1619: बच्चा उम्मैद बख्श

8. जून 1621: सुरैया बानो

9. 1622: शहजादा, जो शायद होते ही मर गया

10. सितंबर 1624: मुराद बख्श

11. नवंबर 1626: लुफ्त्ल्लाह

12. मई 1628: दौलत अफ्जा

13. अप्रैल 1630: हुसैनआरा

14. जून 1631: गौहरआरा


ऐसा नहीं कि बस मुमताज का मौत हुआ हो। कई बच्चे भी मरे उनके। पहली बेटी तीन साल काउम्र में चल बसा। उम्मैद बख्श भी तीन साल में मर गया। सुरैया बानो सात साल में चल बसा। लुफ्त अल्लाह भी दो साल में गुजर गया। दौलत अफ्ज़ा एक बरस में और हुस्नआरा एक बरस का भी नहीं था , जब मरा। यानी 14 में से छह नहीं रहा।


शाहजहां और मुमताज इतिहास का जिस हिस्सा में हुआ , वहां परिवार नियोजन नाम का कोई शब्द नहीं था। न ही ऐसी कोई रवायत था। फैमिली प्लानिंग बहुत मॉडर्न कॉन्सेप्ट है। तब लोग सोचता था, बच्चे ऊपरवाला का देन हैं। जितना होता है , होने दो। कम उम्र में लड़कियों की शादी हो जाता था। ऐसा नहीं है कि भारत में ही औरतें बच्चे पैदा करने में मरती थीं बल्कि यूरोप में भी ऐसा ही हाल था। जब तक हमारा महारानी ने इन सबको इसका बारे में शिक्षित करने के लिए अस्पतालों तथा अन्य सरकारी कार्यालयों में अलग से एक टीम का इंतज़ाम किया जिसमें नए डॉक्टर और नर्स हुआ करता था, इनका काम जगह जगह जा कर सबको "हम दो हमारा दो या हम दो हमारा एक" का मतलब समझाना था। 


ब्रिटिश गवर्नमेंट का ये योजना काफ़ी कामयाब रहा खासकर यूरोपीय देशों में लोगों को यह बात जल्दी समझ में आ गया अगर आज तक किसी के समक्ष में नहीं आया है तो वो भारत, चीन, पाकिस्तान और एशिया के ही देश हैं, जिनमें भारत सबसे ऊपर था और अब भी है, आखिर था तो कमासूत्र का ज्ञान देने वाला देश और इसके इसी ज्ञान का वजह से पहले मुग़ल फ़िर उसका पीछे सारा दुनिया चला आया, इन द नेम ऑफ क्वीन ", कमांडर ने अपनी बात कही और मैं उसकी बातें सुनकर मुस्कुराने लगा।

मैंने कमांडर से कहा "कहाँ आप टाँग खीचने लगे, मी लॉर्ड, कहानी तो सुनाईये"।


"कहानी सुनने का मज़ा तब नहीं आता जब कहानी के केवल कुछ हिस्से ही बताए जाएं, कहानी सुनने का मज़ा तब आता है जब सब कुछ विस्तार से बताया जाए", कमांडर ने कहा।


"अब ताज महल का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ 1630 में शुरू हुआ ताजमहल का बनने का काम करीब 22 साल तक चला। इसे बनाने में करीब 20 हजार मजदूरों ने योगदान दिया। जिनका हाँथ औरंगजेब ने कटवा दिया लेकिन इतिहास इसका इल्ज़ाम शाहजहाँ के ऊपर लगाता है पर हुआ ये था कि शाहजहाँ ताजमहल के निर्माण के बाद ठीक उसका सामने एक और ताज बनाना चाहता था जिसका नाम वह काला ताज रखने वाला था।


ताज महल बनाने का काम चल ही रहा था कि उसी समय हमारा पोस्टिंग हिन्दुस्तान में हुआ, हम हमारा सीनियर ऑफिसर के साथ आगरा का पोस्ट संभाला, हमारे सीनियर ऑफिसर और हमारा उठना बैठना अब शाहजहाँ के दरबार में होने लगा। 


देखते ही देखते कुछ ही दिनों में हम औरंगजेब का ख़ास आदमी में से बन गया, जिससे वह अपना दिल का सारा बात हमको बताने लगा, हम पर विश्वास करने लगा। उन्ही दिनों आगरा के आसपास का इलाकों से अक्सर लूट पाट का काफ़ी ख़बर आने लगा। एक ऐसा लुटेरा जो सिर्फ शाही परिवार को ही नहीं बल्कि व्यापार करने आए सभी मुल्कों का सरकारी सामान लूट लेता था।


उस लुटेरे ने जैसे अपना शिकार चुन लिया हो और उसका निशाना पर मुग़ल सल्तनत के साथ सारा व्यापार करने आया विदेशी मुल्क था । उसकी बुद्धि और ताकत के चर्चे जगह जगह हो रहे थे। उसके निशाने पर खास तौर से शाहजहाँ का शाही खानदान था और औरंगजेब का सेना उससे कई बार मात खा चुका था। 


एक युद्ध जो सेनाओं का साथ मिलकर लड़ा जाता है कुशल मार्ग दर्शन से जीता जा सकता है लेकिन एक युद्ध जो छुप कर लड़ा जाता है उसे जीतना मुश्किल होता है। ऐसा ही कुछ भारत के कई राज्यों में हो रहा था और इसे लड़ने वाला शख्स ख़ुद को गुमनाम रखता था। देखते ही देखते भारत के कई शाही परिवारों को चूना लगने लगा उनका वो ख़ज़ाना खाली होने लगा जिसे वह बड़ा शान से दिखाया करता था। 


इसी सिलसिले में एक बार हमारा ऑफिसर को बादशाह शाहजहाँ का दरबार में बुलाया गया। हम अपना सीनियर का साथ वहां पहुंचा। दरबार में उसी लूटेरा को लेकर चर्चा हुआ। बादशाह ने पहला बार ब्रिटिश को हर राज्य के नगरों में पहला पुलिस चौंकी (पोस्ट) बनाने का अनुमती दिया और इसका काम नगर के साधारण लोगों में से मुखबिरों को बनाना और उन्हें अलग अलग राज्यों में खबरें इकट्ठा कर गुनहगारों को सज़ा दिलवाने में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का मदद करना था, बादशाह ने यह शर्त रखा था कि अगर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी इसमें कामयाब हो गया तो अधिकारिक तौर पर उसे इन चौकियों का अधिकार दे दिया जाएगा वर्ना उन पर बादशाह के ही सैनिकों का अधिकार रहेगा। 


बादशाह शाहजहाँ तो ताजमहल का काम में ज़्यादा लगा रहता था तो लूटेरा और राजनीतिक भागदौड़ का जिम्मा औरंगजेब को दे दिया था। वह राजनीतिक मामलों को अच्छा तरह से संभालने लगा, केवल ताज महल का निर्माण में काफ़ी दौलत खर्च हो गया था और इतना सुन्दर इमारत बनने का चर्चा भारत का हर कोने कोन में होने लगा और यही उस लूटेरे को आकर्षित करने के लिए काफ़ी था उसे पता था, मुग़ल सल्तनत द्वारा बनाया गया ज़्यादातर इमारत लाल मिट्टी का है केवल ताज ही संगमरमर का है और इसे बनाने में काफ़ी दौलत खर्च होगा। 


औरंगजेब भी इसी बात से परेशान था ताजमहल दुनिया का सबसे महंगा इमारत था उस ज़माने का और सबसे भव्य भी। शाहजहाँ का इमारतों को बनवाने का शौक कीमती ख़ज़ाने को लगभग आधा कर चुका था। 


अब इस ख़ज़ाने पर दो लोगों का नज़र था एक ओर गुमनाम लूटेरा था दूसरा तरफ़ ख़ुद औरंगजेब था जो ये जानता था अगला बादशाह वो नहीं भी बन सकता है और बीच में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नाक रखा हुआ था ख़ज़ाने को बचाने के लिए , इन द नेम ऑफ क्वीन। 


औरंगजेब के दिमाग एक योजना ने जन्म लिया, उसका वालिद शाहजहाँ जिसे मूत्र रोग हो गया, कमज़ोर होने लगा था उसे किसी तरह ये एहसास दिलाया जाए कि ख़ज़ाना लूट लिया गया क्यूँकि ताजमहल के बाद बादशाह काला ताज का निर्माण अपने लिए करना चाहता था, ताजमहल अब लगभग पूरा हो चुका था। 

 

उसने अपनी इस योजना को अंजाम देने के लिए बादशाह के जन्म दिन को इस काम को अंजाम देने के लिए चुना क्यूँकि उस समय बादशाह अब भी इतना ताकतवर था कि उसे बन्दी बनाना नामुमकिन था। उस समय तक बादशाह के कुछ ऐसे वफादार विशेष सैनिकों का अपना दल था जो उनके लिए अपना जान तक देने से पीछे नहीं हटता और दरबार में भी ऐसे वफादार मंत्री मौजूद हैं जिनका राजनीतिक हस्तक्षेप है फिर बादशाह का कई राज्यों से अच्छा संबंध था, औरंगजेब के लिए पहले उन्हें अपना ओर करने का ज़रूरत था और कुछ का हत्या। 


उधर वो लूटेरा भी अपना दल का साथ इस ख़ज़ाने को बादशाह के जन्म दिन पर लूटने का योजना बना चुका था क्यूँकि उसी दिन शाही कोष खोला जाता था और ख़ज़ाने का नुमाइश दुनिया भर से आए मेहमानों का वास्ते होता था। यह सालाना जलसा हर साल अपनी ओर दूर दूर से कई लोगों को आकर्षित करता था। बादशाह के पास बहुत अधिक हीरे ज्वाहरात, बेश कीमती कोहिनूर, कई टन सोने का अशरफी चाँदी का सिक्का और बहुत कुछ था ख़ज़ाना में। हर साल जगह जगह का शाही परिवार अपना कीमती भेंट लेकर आता था और उसका जन्मदिन पर सोने , चांदी, हीरे मोती, और कई कीमती चीज़ों से तौला जाता था", कमांडर बताते बताते शांत हो जाता है जैसे कुछ सोच रहा हो।

कमांडर आगे बताता है "औरंगजेब कभी कभी अपना शाही परिवार का बात बताया करता था हमको याद आया कि एक बार उसने कहा था" जानते हो ब्राड शॉ हमारा वालिद बचपन में बताया करता था कि हमारा दादा जानी जहाँगीर उससे कहा करता था कि" एक हीरा का कीमत एक लठ होता है, जिसके हाँथ में लाठी (ताकत) होता है हीरा उसका ही होता है," अब किस्मत का बात देखो कोहिनूर भी उसका ही पास गया जिसके पास ताकत था, जो लोगों पर हुकूमत कर सकता था, कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ता जाएगा, प्रोफेसर तुमको ये हकीकत पता चलेगा कि तकदीर कैसा बाज़ी पलट देता है। हम लोग सोचता कुछ और है लेकिन होता या निकलता कुछ और है। 


ऐसा खास तौर पर दौलत के मामले में होता है, जहाँ बेइंतहा दौलत का भंडार हो वहां उस पर खराब करने वाला का नीयत भी लगा रहता है, कभी कभी छोटा मोटा योजना सफल हो जाता है लेकिन कभी कभी बड़े हादसे का रूप ले लेता है। 


आनेवाले कुछ दिनों बाद मुग़ल सल्तनत को एक करारा झटका लगने वाला था लेकिन उससे पहले हर जगह बादशाह का सालगिरह का तैयारी चल रहा था। नगरों को दुल्हन का तरह सजाया जा रहा था। सारे शाही परिवारों को न्योता भेजने का काम ज़ोरों पर था। देश विदेश का मांझा हुआ कलाकारों को बुलवाया गया था महफिल का शान बढ़ाने के लिए। यही मौका था जब एक कलाकार को महफिल का शान बढ़ाने और हाँथ का सफाई दिखा कोहिनूर गायब करने के लिए रखा जा सकता था। 


इस योजना पर हमने पहले से ही काम कर लिया था, एक ब्रिटिश डांसर का सिफारिश औरंगजेब से लगवा दिया था वो बला का खूबसूरत था उसका काम कोहिनूर को सबका नज़रों के सामने से बड़ा होशियारी से निकालना था। हमारा योजना ये था कि बाद में बादशाह को लौटा कर चौकियों पर अधिकारिक रूप से कब्ज़ा मिल जाएगा। 


इधर हम कोहिनूर को गायब करने का सोच रहा था , उधर औरंगजेब ही ख़ज़ाने का कुछ हिस्सा को उड़ाना चाहता था ताकि काला ताजमहल न बन सके जिसका नींव तक पड़ चुका था, बाद में तो ख़ज़ाना वापस आ ही जाता और शाही कोष में रख दिया जाता। उन चौकियों पर मुग़ल सल्तनत का अधिकार हो जाता और ब्रिटिश कंपनी मुँह देखता रह जाता। 


एक ओर वो लुटेरा बैठा था जो हम दोनों के मंसूबों पर पानी फेरने का मंसूबा बनाए हुए था। सबसे पहले उसको पकड़ कर अपनी योजनाओं को सफल बनाना था। इसके लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने हर जगह कड़ा निगरानी बैठा रखा था। किसी को भी नगर में बिना तलाशी आने और जाने का अनुमती नहीं था। ऐसा निगरानी नगर का हर चौराहे पर हो रहा था। जंगल का कुछ रास्ते पर भी पहरा था जहां से खतरे का अंदेशा था, इन द नेम ऑफ क्वीन, फिर भी हिम्मत दिखाते हुए वो सनसनी खेज़ इंसान अंदर पहुंच ही गया और अपना दल का आदमियों के साथ नगर का हर कोने में फैल गया। 


नगर का हर रास्ते पर बादशाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का सैनिकों के होते हुए। ऐसा हिम्मत वाला इंसान लाखों में एक ही पैदा होता है। हमारा कटा गर्दन भी उसी का देन है लेकिन यह हिस्सा तो कहानी के अंत में आता है, अभी तो बादशाह का सालगिरह होना बाकी है और एमेलिया का मंत्र मुग्ध करने वाला डांस भी, जहाँ शाहजहाँ ने खुद अपने ख़ज़ाने से हीरा और सोने का कुछ अशर्फी खुश होकर दिया था। 


मुग़ल सल्तनत अपना दरिया दिल होने के लिए जाना जाता था खासतौर पर कलाकारों को ज़्यादा बढ़ावा मिलता था। खुद बादशाह शाहजहाँ का महफिल में एक से एक कलाकार मौजूद था। शाहजहाँ कला और मुमताज महल का दीवाना था।


 तुमको भी जो सोना चांदी का मूर्ति उस गुफा में मिला है ज़्यादातर शाहजहाँ का मंझा हुआ शिल्पकार और राज्य का प्रसिद्ध शिल्पीकार के हाथों का है, जो उस सदी में सोने को गला कर उसका मूर्ति बनाने का काम करता था। उस काल में ये एक सफल व्यापार के रूप में उभर कर आया। केवल शाही परिवार ही नहीं बल्कि व्यापार करने आया विदेशी मुल्कों ने इसका भरपूर फायदा उठाया। उस समय कुछ विदेशी मुल्क भारत से इसी तरह सोने का चोरी करता था मूर्ति और कीमती शो पीस बनवाकर। इन्हें ले जाते समय शाही परिवार का भेंट बताया जाता था। 


दिनों को बीतते ज़्यादा समय नहीं लगा और वह पल भी आ गया जिसका हमको, औरंगजेब और उस गुमनाम लुटेरे को बेसब्री से इंतजार था। एक इम्तिहान का घड़ी आ पहुंचा था जिस पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का तकदीर दाव पर लगा था और हम इस बाज़ी को खेलने के लिए तैयार था। हालाँकि दिल का एक कोने में अनजाना सा डर भी था लेकिन आज आर या पार होना ही था। 


एक ओर ऐसा लग रहा था कि कुछ यही हाल उस लुटेरे का भी रहा होगा जिसके प्रति मेरे मन में थोड़ा दुविधा था कि अगर ख़ज़ाना का पीछे आया होगा तो उसमें कोहिनूर ना शामिल हो जाए नहीं तो हमारा योजना बेकार पड़ जाएगा और एमेलिया कोहिनूर नहीं चूरा पाएगा। क्या है, जब दो चोरों का नज़र एक ही लूट का सामान पर हो तो उसे चुराना कभी कभी नामुमकिन हो जाता है। 


वहीं दूसरा ओर अपना सैनिकों का चौकसी के ऊपर हम लोगों को कुछ ज़्यादा ही भरोसा था और हम सभी इस बात से निश्चिंत हो गया था कि वह भी मेहफिल में पहुंच सकता है। 


ऐसा लग रहा था जैसा उस महफ़िल में केवल मेरे ही मन में यह शक़ था कि वह कहीं न कहीं यहीं इसी महफ़िल में है इसलिए मेरा नज़र केवल कोहिनूर के आसपास ही घूम रहा था"।

कमांडर अपनी कहानी जारी रखता है "शालीमार और कोहिनूर दो ऐसा बेशकीमती नगीना था भारत के पास जिनका रंग, आकार, वज़न का जानकारी दुनिया का हर शाही परिवार के पास मिल जाता, ऐसा ही जानकारी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया को भी था, इंगलिस्तान में इन दोनों बेशकीमती रत्न का काफ़ी चर्चा रहता था, इसलिए इन दोनों रत्नों का डुप्लीकेट खोजना उतना मुश्किल काम नहीं था।


अक्सर हर साल भारत में कई शाही परिवारों में ऐसा ही दौलत का नुमाइश किया जाता था जहाँ इन कीमती रत्नों को देखने का वास्ते दूर दूर से रत्न विशेषज्ञों का दल और शाही परिवार के मेहमान पहुंचता था।


उस दिन भी बादशाह का सालगिरह का महफिल में काफ़ी भीड़ था रत्न विशेषज्ञों का। हमने एक नकली हीरा जो हुबहू कोहिनूर की तरह दिखता था एमेलिया को दे दिया था बस उसे बदलना था। कुछ सैनिकों का टुकड़ी को उसका सहायता का वास्ते बादशाह का महफिल में लगवा दिया था ताकि उसे कोहिनूर लेकर जाते समय कोई रोक टोक ना सके। 


महफिल का काफ़ी अच्छा इंतज़ाम किया गया था, हर ओर टर्की, ईरान और कई अरब देशों से आया रक्कासाओं का दिल लुभाने वाला नृत्य हो रहा था, सब एक से एक खूबसूरत था, मुगल सल्तनत खूबसूरती पर फ़िदा रहता था और शाही परिवारों के ख़ज़ाने का एक मोटा हिस्सा हरम खाने में खर्च होता था।  


कुछ ही देर में बादशाह अपना शानदार महफिल में आया, सब लोग उसका रेस्पेक्ट में खड़ा हो गया, इस बार का जलसा कुछ ख़ास इसलिए था क्यूँकि यह सफ़ेद ताजमहल बनने और काले ताजमहल का नींव में काले संगमरमर से रखने का खुशी में भी था। इस बात का एलान होते ही हमने औरंगजेब का चेहरा देखा, उसके चेहरे पर क्रोध तो था ही साथ में एक खतरनाक मुस्कान भी, ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई खतरनाक साज़िश रचा हो जिसके बारे में शायद मुझे भी मालूम ना था। 


शाही फरमान सुनाए जाने के बाद महफिल का शुरुआत होता है। सबसे पहले अपने समय का मशहूर गायिका हीरा बाई ने महफिल का शुरुआत अपना मधुर आवाज़ में किया। हम कभी हीरा बाई को तो कभी औरंगजेब को देख रहा था। हीरा बाई जैसे महफिल में औरंगजेब के लिए अकेले गा रहा हो, उसका ध्यान और किसी पर नहीं जा रहा था, ऐसा ही कुछ हाल औरंगजेब का भी था। हमारे अलावा उस समय औरंगजेब का ख़ास आदमी ही जानता था कि हीरा बाई से औरंगजेब का मोहब्बत चलता था केवल बादशाह को इसका पता नहीं था। अगर पता चलता तो पहले की तरह शाही खानदान में एक बार फिर प्यार का वास्ते बगावत हो जाता। 


हीरा बाई का कोयल जैसा गाने का बाद कई और कलाकारों ने अपना जलवा बिखेरा और महफिल में चार चाँद लगा दिया। ऐसा शानदार महफिल हम पहले कभी नहीं देखा था। कुछ देर बाद एमेलिया का बारी आया, बादशाह और उनका दरबार का सारा आदमी एमेलिया के हुस्न और मोहक नृत्य को देख कर जैसा खो सा गया, महफिल के हर कोने में खड़े और बैठे लोगों को उसने अपना खूबसूरत जिस्म का प्रदर्शन कर अपना ओर आकर्षित कर लिया। मोहक नृत्य देखकर बादशाह ने ख़ुद खड़े होकर उसका तारीफ़ किया, बादशाह के खड़े होते ही महफिल का सारा मेहमान खड़ा होकर उसका अभिनंदन करने लगा, ख़ुश होकर बादशाह ने उसे कुछ अशर्फ़ी और कुछ हीरा उपहार स्वरूप दिया। ऐसे ही महफ़िल आगे बढ़ा। 


कुछ देर बाद बादशाह का वजन करने का बारी आया, सभी कीमती उपहार जैसे हीरे, पन्ना, नीलम, मोती कीमती रत्नों से वजन करने के बाद उन्हें राज कोष के लिए रख दिया गया उसका बाद चाँदी के सिक्कों से तौला गया और बादशाह का वजन के बराबर सिक्कों को प्रजा में बांट दिया गया, अब सोना का अशर्फी का बारी था जिससे कई बार बादशाह का वजन कर राजकोष में रखने का वास्ते अलग किया गया, उसका बाद रेश्मी वस्त्रों से दो बार तौला गया जिसका एक हिस्सा प्रजा में बांटा गया, रेश्मी वस्त्रों के बाद आभूषणों का बारी आया जिसमें बादशाह का वजन के बराबर हीरा मोती, सोना चांदी तथा अन्य नगीनों के हार, अंगूठी, कड़ा, चूड़ी, बालीयां इत्यादि शामिल था करीब दो बार बादशाह को इन आभूषणों से तौला गया। इसके बाद पृथ्वी का हर कीमती चीज़ से बादशाह को तौला गया। 


इसके कुछ ही देर बाद महफिल में कुछ हलचल सा हुआ, औरंगजेब का विशेष सैनिक दल कुछ परेशान सा था, बार बार मंच पर आकर उसका एक सैनिक कान में कुछ बोलता था फिर औरंगजेब उसको कुछ बोलकर भेजता था, जब बात हाँथ से निकल गया होगा तो औरंगजेब ख़ुद उसका साथ गया। 


पहले तो हम थोड़ा डर गया कि कहीं एमेलिया तो नहीं पकड़ा गया, पर उसे महफिल और महल से गए काफ़ी समय हो गया था, उसे तो रात मेरे बंगले पर हमबिस्तर होकर बिताना था। फिर हमने मन में सोचा चाहे कुछ भी हो जाकर देखना पड़ेगा, तो हम भी औरंगजेब के पीछे चल पड़ा। वह अपने राजकोष की तरफ़ जा रहा था, कुछ दूर आगे बढ़ते ही राजकोष के द्वार के सामने करीब दो दर्जन सैनिक मरा हुआ पड़ा था। अन्दर से ख़ज़ाना देखकर आए एक सैनिक ने कहा "हुज़ूर ख़ज़ाने का कुछ हिस्सा लूट लिया गया है और किले से बाहर ले जाया जा चुका है"। 


औरंगजेब ने मेरा तरफ़ देखते हुए कहा "कमांडर फौरन अपना सिपाहियों को बोलकर नाकाबंदी कराएं, लुटेरा अभी ज़्यादा दूर नहीं गया होगा, हम उसे पकड़ सकते हैं"। 


हम भागते हुए गया और किले में मौजूद ब्रिटिश सिपाहियों को लेकर ख़ुद नगर के दौरे पर निकल गया। उस लूटेरे को पकड़ने के लिए चारों ओर फैल गए। नगर और जंगल के रास्तों पर सैनिक टुकड़ी लगा दिया गया। 


अच्छा खासा रात खराब हो चुका था और सारे किए कराए पर इस लूटेरे ने पानी फेर दिया था, क्या सोचा था और क्या हो गया, सोचा था आज रात एमेलिया का नाज़ुक बाहों में बीतेगा, पर इस लूटेरे ने तो नाइट ड्यूटी लगवा दिया था। 


साथ में हम यह भी सोच रहा था क्या एमेलिया ने कोहिनूर चूरा लिया होगा, अगर हां तो उसे होशियार रहने का ज़रूरत था। "


अंतिम अध्याय -


कमांडर कहानी जारी रखता है "रात भर गश्त लगाने के बाद भी लुटेरा हाँथ नहीं लगा हम अपना जूनियर ऑफिसर को पोस्ट संभालने को बोला ताकि अपने बंगले का एक चक्कर लगा कर ये पता लगा सके कि क्या एमेलिया ने कोहिनूर चूरा लिया? 


हम जैसे ही अपना बंगला पर पहुंचा एमेलिया भागते हुए आया और हमारे सीने से लग कर बोला "What took you so long, I waited for you whole night, my love", हम एमेलिया को सारा बात बताया कि उसका वहाँ से जाने के बाद क्या हुआ। फिर हमने उससे कोहिनूर का बारे में पूछा।


एमेलिया ने जवाब दिया "तुमको क्या लगता है ब्राड हम उस हीरा को चुरा पाया होगा, हम इंग्लैंड से इतना दूर अपना जान जोखिम में डाल कर सिर्फ तुम्हारा वास्ते ही हीरा चूरा लिया, पर तुम है कि ड्यूटी में लगा है"।


हमने एमेलिया को अपना बाहों में भर लिया और चूम लिया, फिर उससे कोहिनूर लेकर उसे अच्छी तरह से देखने लगा क्यूँकि इस एक कीमती पत्थर ने ना जाने कितने लोगों का लहू बहाया होगा, ना जाने कितने राज्यों का बीच झगड़ा कराया होगा, यह एक ब्लड स्टोन था जो उसी का शान बनता था, जो रक्त पात करने में पीछे नहीं हटता था। हमारा एक योजना तो काम कर गया था और अब किसी को शक़ भी नहीं होना था कि ये ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के पास है। इसे चुराने का भी आरोप अब उस लुटेरे के ऊपर लगना था।


थोड़ा देर बाद किले से बादशाह का एक सिपाही आया और उसने बताया कि बादशाह ने फौरन याद किया है । हम अपना सीनियर के साथ बादशाह के दरबार में पहुँचा। वहां जाकर सारा हाल पता चला कि ख़ज़ाना का एक बड़ा हिस्सा लूट लिया गया था , जिसके बारे में कल रात में अच्छी तरह से पता नहीं चल पाया था, ख़ज़ाने का साथ बेशकीमती कोहिनूर भी लूट लिया गया था। बादशाह ने हमारा सीनियर को फटकार लगाते हुए कहा "ब्रिटिश कंपनी तो बड़े बड़े दावे कर रही थी कि लुटेरे को पकड़ लेगी, राज्य में अमन शान्ति रहेगी, अब क्या हुआ, कैसे हमारे उस अधूरे सपने काले ताजमहल का निर्माण होगा, बताइए है कोई जवाब, अब उन चौकियों पर मुगल सल्तनत के सिपाहियों का राज रहेगा, जब तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया की ओर से उस लुटेरे और ख़ज़ाने से संबंधित सुराग़ हाँथ नहीं लगता या लुटेरा पकड़ने की कोई कार्यवाही नहीं की जाती ", बादशाह क्रोध से आग बबूला हो गया था।


दरबार ख़त्म होने के बाद औरंगजेब ने अकेले में बुलाया फिर हमसे कहा" क्यूँ कमांडर अब तो चौकियों पर मुगल सल्तनत का सिपाही लोगों का ही राज रहेगा, मेरे पास तुम्हारे लिए एक सुझाव है अपने अधिकारियों से कहो नगर चौकसी करना और बादशाह का हिफाज़त करना उनके बस का नहीं है, मुग़ल सल्तनत के सिपाही जनता की कामज़ोरी जानते हैं, फिरंगी इसमें कुछ नहीं कर पाएंगे, ख़ैर अब जब बादशाह ने हुक्म दिया है तो अमल में लाना पड़ेगा जाइए और उस लुटेरे का पता लगाइए देखिए कोई सुराग हाँथ लगता है या नहीं "। 


हम थोड़ा देर का वास्ते एक गहरा सोच में पड़ गया क्यूँकि औरंगजेब का बातों में ताना मारने का अंदाज़ था ऐसा लग रहा था मानो वह सब जानता हो कि ख़ज़ाना कहां है या उसे किसने लूटा, फ़िर बोला " जल्द ही मिल जाएगा वो अब भी इसी नगर के आसपास ही होगा क्यूँकि नगर से निकलने के हर रास्ते पर चेक पोस्ट बैठा दिया है, जंगल के सभी मार्गों को सीज़ कर दिया गया है, नगर के सभी घरों की तलाशी का ऑर्डर दे दिया गया है, आखिर उस लुटेरे से नुकसान केवल शाही मुग़ल परिवारों को ही नहीं बल्कि ब्रिटिश कंपनी को भी है। हम अभी चलता है इस लुटेरे का निगरानी का काम और ज़ोर पर चालू करवाता है ", हम बोलकर वहाँ से सीधा अपने हेड क्वार्टर गया। सारे सिपाहियों और जूनियर स्टाफ़ को इकट्ठा कर के उस लुटेरे के बारे में जानकारी लाने को कहा, उन्हें नगर की निगरानी बढ़ाने को कहा, उन्हें ये एहसास कराया कि यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के इज़्ज़त का सवाल है, नहीं तो हर नगर में बनी चौकियों पर मुग़ल तथा अन्य सैनिको का अधिकार हो जाएगा।


मामला काफ़ी संगीन हो गया था हालांकि आज पहला ही दिन था लेकिन काफ़ी परेशान कर देने वाला था। शाम तक हेड क्वार्टर में सिपाहियों द्वारा किसी अच्छी खबर सुनाए जाने का इंतजार किया, पर कुछ भी हाँथ नहीं लगा, हम समझ गया कि इतनी आसानी से हाँथ आने वालों में से नहीं है, उसको पकड़ने का वास्ते कुछ अलग ही तरकीब लगाना पड़ेगा। नगर में निगरानी और तलाशी का काम तब तक जारी रखवाना पड़ेगा जब वह या उसके दल के सदस्यों में से एक बारे में पता नहीं चल जाता। सब कुछ सोचते विचारते और अपने सीनियर से इस पर राय मशवरा करने और हेड क्वार्टर से ड्यूटी ख़त्म करने के बाद हम सीधा अपने बंगले की तरफ़ रवाना हो गया जहाँ हुस्न परी एमेलिया हमारा इंतज़ार कर रहा था, उसे तो भारत में केवल हफ़्ते भर ही रहना था, सोचा था हंसी पल बिताएंगे पर इस लुटेरे ने सब चौपट कर दिया। 


इतना सालों के बाद दो प्रेमी फिर से मिला था, लंदन में तो लगभग रोज़ मुलाकात होता रहता था। एमेलिया को हम ब्रिटिश कंपनी जॉइन करने के पहले से ही जानता था। हम लोग कभी पड़ोसी हुआ करता था, एक दूसरे के घर में आना जाना लगा रहता था, पर ज़िंदगी आगे बढ़ा हम कंपनी जॉइन किया देश विदेश घूमकर हिन्दुस्तान आ गया और एमेलिया वहीं लंदन में ही स्टेज आर्टिस्ट बन गया। 


हम अपना बंगले का तरफ़ जाते समय रास्ते में ये सारा बात सोचते हुए जा रहा था कि अचानक किले से कुछ परछाईयों को घोड़े पर सवार होकर जंगल की तरफ जाते हुए देखा। ये लोग किले के गुप्त रास्ते का इस्तेमाल कर जंगल से होते हुए जा रहे थे, हम भी अपने घोड़े को उनके पीछे दौड़ा दिया, घोड़े के दौड़ लगाने का आवाज़ से उन्हें यह पता नहीं चल पाया कि हम उनका पीछा कर रहा था।


घोड़ों को सरपट दौड़ाते हुए वो लोग जंगल के काफ़ी भीतर जाकर एक सुनसान गुफा के पास रुके जहाँ पहले से ही कुछ लोग जमा थे और चारों तरफ़ मशाल जल रहा था। हम उन अज्ञात घुड़सवारों से उचित दूरी बनाकर जंगल में छुप गया जहाँ से उनपर आसानी से नज़र रखा जा सकता था। उन घुड़सवारों ने अपने चेहरों को नकाब से छुपा रखा था। उनका सरदार घोड़े से उतरकर उस गुफा के सामने खड़े अपने आदमियों से सारा हाल चाल लेता है। फिर वो धीरे से अपने चेहरे से नकाब को हटाता है।


फ़िर हम जो देखा वो मुग़ल सल्तनत के पैरों के नीचे ज़मीन खिसकाने के लिए काफ़ी था, नकाबपोश घुड़सवारों का सरदार औरंगजेब था और उस गुफा में बादशाह का लूटा हुआ ख़ज़ाना रखा गया था, जिसका हिफाज़त औरंगजेब के विशेष सैनिक दल के कुछ सिपाही कर रहे थे। वो लोग वहां काफ़ी देर रुके फिर वही घुड़सवार अपने अपने घोड़ों पर सवार होकर किले की ओर रवाना हो गए। हम थोड़ा देर वहीं रुका रहा उस इलाके और उन सिपाहियों की अच्छी तरह से जानकारी लेने के लिए। जब हम पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि उन गिने हुए 30 सिपाहियों के अलावा वहाँ और कोई नहीं है तब हम वहाँ से चुपचाप रवाना हो गया।


हम मन ही मन काफ़ी ख़ुश था लूटा हुआ ख़ज़ाना मिल गया था, अब उन सभी चौकियों पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया का ही अधिकार रहेगा। पर मन में यह दुविधा था कि औरंगजेब ने ख़ज़ाना लुटवाया था तो कोहिनूर के बारे में भी उसे पता होगा, बादशाह कोहिनूर का भी नाम उस लुटे ख़ज़ाने में ले रहे थे। इसका मतलब यह है कि उस लुटेरे पर ही कोहिनूर को ग़ायब करने का शक़ औरंगजेब को भी है। 


पर अब बड़ा सावधानी से चाल चलने का समय है क्यूँकि हमको ये तो पता था कि औरंगजेब काला ताजमहल बनवाने के ख़िलाफ़ है इसलिए ऐसा किया था लेकिन हमको ये नहीं मालूम था कि उसके दिमाग में आगे क्या क्या योजना बन रहा था, अब जब ये पता चल गया था कि ख़ज़ाना ज़्यादा दूर नहीं गया था अभी सीमा के अंदर ही था तो अब बहुत सोच समझ कर सब करने का समय था जल्द बाज़ी में नहीं। 


पहले ख़ज़ाने को इस जंगल से निकालना था फिर किसी तरह मौका पाकर इसे बादशाह के समक्ष पेश करना था उनका विश्वास जीतने के लिए और उन सभी चौकियों का ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को अधिकार दिलवाना था।


अगली सुबह हम सीधे हेड क्वार्टर गया और अपने कुछ ख़ास सैनिकों का एक लिस्ट बनाया, जो एक से बढ़कर एक सूरमा था, अब तक ख़ज़ाने का किसी को भनक तक नहीं लगने दिया था, जो कुछ भी करना था सब गोपनीय ढंग से करना था। गुफा के आसपास सैनिक दल अच्छा खासा रोशनी जला कर रहता था रात में ताकि जंगली जानवरों से भी बचे और रात में हर चीज़ अच्छा तरह से दिखाई पड़े इसलिए कुछ तीरंदाज काफ़ी थे उनका सफाया करने के वास्ते, फिर भी हम कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था इसलिए कुछ बंदूक धारियों को भी साथ में शामिल कर लिया था। तीरंदाजी से काम शांति पूर्वक हो जाता बंदूक से बेवजह शोर होता है इसलिए मेरा योजना था कि औरंगजेब के सैनिकों को रात के समय तीरंदाजों के दल का निशाना बनवाकर ख़ज़ाना लेकर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो जाना, अगर बात हाँथ से बिगड़ती तब बंदूक धारियों का दल था संभालने का वास्ते । अब बस रात होने का इंतजार था। 


रात होते ही योजना के मुताबिक तीरंदाज और बंदूक धारियों के दलों को जंगल में दूसरा दिशा से लेकर अंदर घुसा ये रास्ता लम्बा ज़रूर था लेकिन घोड़ों का वास्ते उपयुक्त था। रात में चारों तरफ़ जानवरों के रोने का आवाज़ आ रहा था हमलोग धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे ताकि घोड़ों के तेज़ दौड़ने का आवाज़ सुनकर दुश्मन सतर्क न हो जाए, कुछ ही देर बाद हमलोग गुफा के पास पहुंचे। चारों तरफ़ ख़ामोशी, ऐसा लग ही नहीं रहा था कि एक रात पहले यहाँ इतने सैनिकों का दल था। फिर भी हम लोग घोड़े से उतरकर, अंधेरे में गुफा की तरफ़ आगे बढ़ा, कुछ देर बाद एक अंग्रेज सिपाही ने एक मशाल ढूँढकर उसे अपना जेब में पड़े माचिस से जलाया, तो देखा चारों ओर मुग़ल सिपाहियों का लाश पड़ा हुआ था। वहां एक भी सिपाही ज़िन्दा नहीं बचा था, सबको मार दिया गया था, ख़ज़ाना भी वहाँ से गायब था, हमको बस एक सोने का अशर्फी उस गुफा में पड़ा हुआ मिला। 


हम सबने वहाँ ज़्यादा देर रुकना मुनासिब नहीं समझा इसलिए वहां से जांच पड़ताल कर फौरन ही नगर की ओर चल दिए क्यूँकि हो सकता था कि औरंगजेब रात में एक बार चक्कर मारे। हम फौरन समझ गया था कि अब ये काम उस गुमनाम लुटेरे का था, औरंगजेब ने खुद शाही ख़ज़ाना लूटवाकर उसके हाँथ में राज कोष के ताले का चाभी रख दिया था। मेरा भी सारा मेहनत बेकार चला गया। 

कमांडर आगे की कहानी सुनाता है "अगला सुबह हम उन्ही सिपाहियों के दल से अपना ख़ास 9 दोस्तों को बुलाया, वो सब मंझा हुआ शिकारी था फिर चाहे इंसान का शिकार हो या जानवर का। हम उनसे बताया कि हम एक योजना बनाया है जिसमें नगर का आस पास के इलाकों में British regiment को ख़ज़ाने के काम पर लगा दिया है, आस पास के नगर में हर खबरी को सोने का मूर्ति और कीमती शो पीस बनाने वाले पर नज़र रखना है और कोई भी ख़बर मिलते ही सीधा हमारे हेड क्वार्टर पर संपर्क करना है, हम लोग आज दोपहर को ही ख़ज़ाने की तलाश में अगले नगर का ओर निकलेंगे जंगल का रास्ता पकड़ कर , ये एक खुफिया मिशन होगा जिसमें शिकारियों का रूप धारण करना पड़ेगा, ब्रिटिश गवर्नमेंट का हर हेड क्वार्टर पर रिपोर्ट देना होगा जहां से हमलोगो को उस लुटेरे का जानकारी भी मिलेगा। उसके पास टनों सोने का अशर्फी था जिसे ले जाने में कम से कम पाँच घोड़ा गाड़ी लगेगा, वो शर्तिया इन सामानों को कम करके ही ले जाएगा इसलिए वह इन अशर्फी की संख्या कम करने का वास्ते इन्हें मूर्ति, आभूषण या शो पीस में बदलने के वास्ते उसे आकार देने वाले से मिलेगा, अगर हमारा अंदाज़ा ग़लत नहीं था तो वो लुटेरे जंगल के रास्ते नज़दीकी समुन्द्र तट के नगर की ओर जाएंगे और वहीं से उसका पीछा कर रहे हम सब मिलकर उसे दबोच लिया जायेगा। 


ब्रिटिश हाई औथॉरिटीज़ के अलावा हमारा इस मिशन का जानकारी किसी को नहीं था इसलिए हर नगर में यही दिखाना था कि हम भारत में शिकार का वास्ते आया है ऐसे उन लुटेरों को भी यह यकीन हो जाता कि हम विदेश से आए शिकारी हैं। भारत में खबरें हवा की तरह फैलती थी ऐसे में लुटेरे को पता चल जाता कि हम लोग ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के ऑफिसर हैं, इसलिए सबको यकीन दिलाना ज़रूरी था कि हम सब का जानवरों के सिर का trophy और खाल ही व्यापार है। ज़रूरत पड़ने पर नज़दीक के हेड क्वार्टर से सैनिक टुकड़ी भी मदद के वास्ते दे दी जाती ।


हमारा जांबाज़ साथी लोग इस मिशन पर अपना जान का बाज़ी लगाने को तैयार हो गया और हम सभी ने अपने सीनियर अधिकारियों से मिलकर इस मिशन पर जाने का अनुमति लिया । ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी हाई अथॉरिटीज़ के अधिकारियों को यही पता था कि ख़ज़ाना उस लुटेरे के ही पास है। औरंगजेब ने खुद ख़ज़ाने पर डांका डाला था ये सिर्फ हमको पता था पर ख़ुद औरंगजेब को ये नहीं पता था कि हमको सब पता है।


उधर औरंगजेब को ख़ज़ाने के बारे में पता लगते ही उसने गुस्से में ख़बर देने वाले का गर्दन धड़ से अलग कर दिया अपना तलवार का वार से । उसने तलवार बाज़ी में अच्छे अच्छों को धूल चटाया था। उसका तलवार बिजली के रफ़्तार जैसा चलता था। उसका क्रोध इतना बढ़ गया कि उसने अब अपने वालिद के सारे ख़ास समर्थकों का सफाया करने का फैसला किया। ऐसा करने पर बादशाह कामज़ोर पड़ जाते और औरंगजेब अपने बल और सैन्य ताकत से तख्त पर कब्ज़ा जमा लेता। पर इस योजना पर काम करने से पहले उसने अपने एक ख़ास मित्र को बुलवाया ताकि वो उस ख़ज़ाने को लूटने वाले का पता लगा सकें और उसका सफ़ाया कर ख़ज़ाना उसके पास ले आए। वो भारत के जंगलों और नगरों की गलियों से अच्छी तरह से वाकिफ था। 


हम लोग दोपहर को अपनी योजना के हिसाब से जंगल का ओर निकल गए। जाने से पहले आखरी बार हम एमेलिया को अपने सीने से काफ़ी देर तक लगाए रहा। वो भी हमको कस कर जकड़े हुए थी, ऐसा लग रहा था कि हो सके दुबारा ना मिले, सो दो प्रेमी एक दूसरे से अलग ना हो जाएं इसलिए एक दूसरे को कस कर सीने से लगाए हुए थे और चुम्बन से एक दूसरे को अलविदा कह कर अलग हो गए। कोहिनूर हमारे ही पास था क्यूँकि एमेलिया के पास इसका रहना उसका जान पर आफ़त बन सकता था। एमेलिया भारत से जाते समय तक हमारे ही बंगले पर रुकी रही। 


एक रात जंगल में बिताने के बाद अगले दिन हमलोगो के हाँथ सफलता लगा। हमारे दल के एक सदस्य को घोड़ों का लीद मिला। उसने घोड़े से उतरकर एक छोटी सी लकड़ी की छड़ी ज़मीन से उठाई, फिर उसे घोड़े के लीद में घुसा कर यह देखा की कितना गीला है। फिर उस लकड़ी की छड़ी को अपना नाक के पास ले जाकर सूँघ कर बोला "यह करीब नौ घंटे पहले का है", यह एक आम तरीका था ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उन सिपाहियों का जो शिकार में और लुटेरों को ढूंढने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। किसी जानवर का लीद हो या इंसानी मल समय के साथ इनमें बदलाव आता है, ये सूखने लगते हैं और इनकी गंध भी बदल जाती है। 


हमने कहा कि "हम सब सही दिशा में जा रहे हैं अब बस सीधे चलते रहना है, बीच बीच में घोड़ों को आराम देकर फिर उन्हें रफ़्तार से दौड़ाना है। उन लुटेरों के पास वजन ज़्यादा है, उनके घोड़े इतना रफ़्तार नहीं पकड़ पाएगें और हम लोग उनके काफ़ी नज़दीक पहुंच जाएगा"। 


योजना के मुताबिक चल कर समुन्द्र तट वाले कलकत्ता पहुंचने से पहले ही हम लोग उनके दल के काफ़ी नज़दीक पहुंच गए, अब ख़ुद को पाँच पाँच के दल में बांटकर दोनों दिशाओं से उनसे अच्छा खासा दूरी बनाकर हम उनके साथ साथ ही यात्रा कर रहे थे। उनका संख्या काफी था इसलिए हमारा एकदम से हमला करना मूर्खता साबित हो सकता था तो हमने नगर पहुंचने तक का इंतजार किया। 


नगर पहुंचते ही हम और एक साथी उस नगर का हेड क्वार्टर गया और वहाँ का हाई कमांड को अपना सारा रिपोर्ट देकर मदद का वास्ते सैनिकों का डिमांड किया। वहां के हाई कमांड ने तुरन्त एक्शन लिया, चूंकि हमलोगो को पता था वो लोग नगर की सीमा के पास रुके हैं इसलिए सिर्फ कुछ सिपाहियों की सैनिक टुकड़ी का सहायता से उन्हें पकड़ा जा सकता था। 


सैनिकों को लेकर ख़ुद नकाबपोश शिकारी के भेस में उन लुटेरों को गिरफ्तार करने के वास्ते हमला किया। काफ़ी देर मुदभेड़ चलता रहा, फिर उनके तरफ़ से गोला बारी थोड़ा कम हुआ तो हमलोगो को लगा कि हम सब जीत के रास्ते पर हैं। हमलोगो की तरफ से हमला जारी रहा, कुछ देर बाद सन्नाटा हो गया। उनका सारा आदमी मर गया शायद, ये सोचकर आगे बढ़ा तो देखा महज़ पंद्रह लोग हमारा रास्ता रोके हुए थे और बाकी का दल निकल चुका था। हमने मौका पाते ही एक की जेब में कोहिनूर डाल दिया और फिर उसके मिलने का दिखावा किया जिससे सबको यकीन हो गया कि ये वही शाही ख़ज़ाने के लुटेरे थे। खबर सभी जगह आग की तरह फैल गई, औरंगजेब को जब यह पता चला तो वह काफ़ी शर्मसार हुआ क्यूँकि अंग्रेज बाज़ी मार ले गए। कोहिनूर को शाही परिवार तक फ़िर से पहुँचवाकर उन चौकियों पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को अधिकार बादशाह से दिलवा दिया।  


हम दस जांबाज़ शिकारियों ने फिर से उन लुटेरों का पीछा करना शुरू किया वहीं से जहाँ से उनसे मुदभेड़ हुआ था। हमने उसी तरह अपना सफ़र जारी रखा, बीच बीच में घोड़ों को आराम देते फिर उन्हें पूरी रफ्तार से दौड़ाते। 


इस बार वो लूटेरे समझ चुके थे कि किसी ने पीछा किया था और अब समुन्द्र का मार्ग पकड़ना सही नहीं होगा इसलिए उन्होंने जंगल के रास्ते फिर से सफ़र तय करना शुरू किया लेकिन आगे का रास्ता पहाड़ों से होते हुए तय करना पड़ेगा यह किसी ने नहीं सोचा था। 


हुआ ये कि जंगल के रास्ते एक बार फिर वो पास के नगर में पहुंचे, पर इस बार हम सबने जल्द बाजी नहीं दिखाया। उन्हे वहाँ थोड़ा दिन रुक कर कुछ टन सोने का अशर्फीयों को पिघला कर उन्हें मन चाहे आकृति में बदलने का मौका दिया। इस बार वह लोग इस बात से निश्चिंत हो गया था कि कोई पीछा कर रहा था। बेफिक्र हो कर शहर में घूमने फिरने लगे। वो सभी अलग अलग होकर रुकते थे लेकिन सोने के अशर्फीयों को पिघला कर आकृति देने वाला काम सरदार के मुख्य आदमी का था। एक दिन उस सोने का शिल्पकार का ख़बर एक खबरी ने दिया उस नगर के चौकी पर, खबर हम तक पहुंचा और हेड क्वार्टर से सिपाहियों को इकट्ठा कर एक बार फिर से नकाबपोश शिकारियों के रूप में पीछा कर हमला किया। इस बार नगर में होने की काफ़ी अफरा तफरी मच गया।


हम सबने सोचा सारा ख़ज़ाना एक ही जगह पर होगा लेकिन ख़ज़ाना फ़िर से हाँथ से निकल गया। इस तरह उन लुटेरों को यकीन हो चला था कि आगे बढ़ना सही नहीं होगा फिर से एक बार उन्होंने जंगल का रास्ता अपनाया हमने फिर उनका पीछा शुरू कर दिया, पर उससे पहले नगर में हमारे हाँथ उस ख़ज़ाने का ज़रा सा हिस्सा लगा जिसमें कुछ टन अशर्फीयां थीं। वहाँ सबको यह आदेश दे दिया कि जो मिला है सीधे शाही परिवार के हाँथ में दो ताकि मुग़ल बादशाह और बाकी के शाही खानदान को ये पता चले कि हम ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के जांबाज़ सिपाहियों के आगे कोई औकात नहीं है मुग़ल सैनिकों का, ऐसा करने से शाही परिवार का हम पर विश्वास भी बढ़ता और वे सभी थोड़े शर्मिंदा भी होते। 


मेरे इस हुक्म पर चलते ही और बादशाह को ख़ज़ाने के हिस्से की कुछ टन अशर्फीयां मिलते ही वो समझ गए कि अंग्रेज सिपाही किसी से कम नहीं थे, औरंगजेब को भी अब एहसास हो चला था कि बिना ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने साथ मिलाये वो नहीं चल सकता है। इसलिए उसने ब्रिटिश हाई कमांड के साथ हाथ मिला लिया और उन अधिकारियों ने औरंगजेब का साथ दिया। इस तरह से आपस में मिलकर उन मज़दूरों के हांथों को कटवा दिया गया जिन्होंने ताजमहल बनाया था और काले ताजमहल को बनाने की तैयारी कर चुके थे। उन सबने मिलकर रिपोर्ट में बादशाह के ख़िलाफ़ ख़ज़ाना लुट जाने की वजह से अपना दिमागी संतुलन खो कर मज़दूरों के हांथों को कटवाने का फरमान सुना दिया क्यूँकि काला ताजमहल नहीं बन पाया था, ऐसा दिखा दिया। 


उधर उन लुटेरों का पीछा करते हुए फिर से एक समय ऐसा आया कि हम उनके बेहद नजदीक पहुंच गए लेकिन उचित दूरी बनाए रखा। इस बार उन्होंने केवल जंगल का ही मार्ग पकड़ा जिसमें किसी भी सूरत में नगर का आना नामुमकिन था। 


हम लोग भी अब थोड़ा चिंतित हो गए क्यूँकि एक तरह से बिना सहायता के उन्हें पकड़ना नामुमकिन था, ऐसा लग रहा था जैसे उन लुटेरों का सरदार उस ख़ज़ाने को कहीं छुपाने ले जा रहा था जिस ख़ुफ़िया जगह का उसे पहले से ही पता था और हम सबको सहायता केवल नगरों से ही मिल सकता था। कुछ दिनों तक ऐसे ही सफ़र करते करते हमारे दिमाग में एक योजना आई कि क्यूँ न इन्हें एक एक कर संख्या में कम किया जाए, हम दस हैं और अगर रोज़ एक एक भी मारें तो इनके रोज़ाना दस आदमी मरेंगे क्यूँकि अब भी इनके दल में चालीस लोग हैं। अब यही एक आखरी रास्ता बचा था उनसे निपटने का। हम सबने इस विचार पर अच्छे से सोचा और इसे हरकत में ले कर आने में तीन दिन बिता दिए, अब हिमालय के ऊंचे पहाड़ और ठंड सफ़र का हिस्सा बन चुके थे। अच्छा ये हुआ कि हमने उनका पीछा करने से पहले ही नगर के हेड क्वार्टर से गर्म कपड़े और कम्बल ले लिये थे क्यूँकि हल्की ठंड का एहसास तो वहीं से शुरू हो गया था , फिर हमारे पास उन जानवरों के खाल भी थे जिनका हमने रास्ते में शिकार कर अपना भोजन बनाया था, उनमें ज़्यादातर हिरण शामिल थे। पर असली चिंता ठंड का नहीं था, चिंता था खतरनाक खाई और प्राकृतिक विपदाओं का जो उन पहाड़ों पर कभी भी हमारी कहानी का रुख़ बदल सकता था। 


फ़िर भी अपने योजना पर हम सबने काम किया और पहले दिन सुबह का सूरज दिखने से पहले ही उनके दस आदमियों का शिकार कर दिया, वो सुबह शौच क्रिया करने जंगल की झाड़ियों में बैठे थे । अपना तरफ़ से हमलोगो ने पूरा कोशिश किया की सब कुछ किसी जंगली जानवर का काम लगे और पहले दिन इसमें हम सब कामयाब भी हो गया ।अब उन लुटेरों के दल में केवल तीस लोग ही बचा था। 

लुटेरों ने मिलकर मरे हुओं को दफनाया और आगे बढ़ने का तैयारी करने लगे । 


हम सब भी उचित दूरी बनाकर उनका पीछा कर रहे थे, अब तक हम लोग उनके नज़र में नहीं आए थे। एक और दिन का अंत अंधेरी रात के साथ हुआ, हम लोग छुप कर और थोड़े समय बीत जाने का इंतज़ार कर रहे थे। मौका पाते ही हमने फ़िर से दस शिकारों पर धाबा बोला जो सुबह शौच क्रिया करने के वास्ते अपने दल से अलग हुए, पर उनका शिकार करते हुए बदकिस्मती से हमारे एक साथी को पेट में खंजर लग गया, पर हम सबने मिलकर उसे वहाँ से हटा लिया। जब रौशनी हुई तब उन लुटेरों को इसका पता चला। उन्हे अब इस बात का भनक लग गया था कि कोई उनका पीछा कर रहा है इसलिए उनमें से कुछ ने काफ़ी दूरी तक हर दिशा में हम सबको तलाश किया पर हम सब तक नहीं पहुंच पाए। 


फ़िर तीन दिन तक उनके दल पर नज़र रखते हुए उन्ही के साथ चलते रहे क्यूँकि हमारा एक साथी अब भी घायल था, इसलिए बड़ी चतुराई के साथ उनकी नज़रों में ना आकर, उनके साथ चलते रहे। हम सब अब उसी इलाके में पहुंच चुके थे जिस गुफा से तुम्हें ख़ज़ाना और हम मिले, पर गुफा अब भी काफ़ी दूर थी। 


हमारे साथी की हालत सुधरते ही हम सब उस गुफा के नज़दीक पहुंचे, हमको इस बात का शक़ हो गया की ये लोग ख़ज़ाना यहीं कहीं आसपास ही छुपा रहे हैं क्यूँकि काफ़ी दिनों से एक ही जगह पर रुका हुआ था उनका दल इसलिए हम सबने मिलकर उसी दिन हमला करने का योजना बनाया। हमारे पास काफी गोलियां थी और कुछ हत्यार और गोलियां उन मरे हुए लुटेरों से चुराई थीं। 


सभी ने उस दिन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का यूनीफॉर्म पहना था जो इतने दिनों से हम सबने संभाल कर अपने सामान के साथ रखा था, फिर अपना अपना जगह चुना और हमला करने के लिए चारों ओर फैल गए । पहाड़ों की वजह से हम सबको देख पाना मुश्किल था। हम लोगों ने सीधा उनके पड़ाव पर हमला करने का फैसला किया जहाँ दस लोग थे। 


जैसे ही हमने पहला गोली चलाकर एक आदमी को गिराया, बाकि सबने भी अपने अपने हिस्से के शिकारों को मार गिराया, अब उन लुटेरों के दल में कुल दस आदमी ही बचे थे जो शायद ख़ज़ाने को गुफा में रखने का काम कर रहे थे, हम सब उनके पड़ाव से आगे बढ़े, तब तक गोली की आवाज़ सुनते ही वो सभी सतर्क हो गए, उन्होंने पहले ही छुप कर वार किया दो गोलियां चलते ही हमारे दो साथी मारे गए। हम सबने भी चट्टानों का आड़ लिया और छुप कर मुकाबला किया। गोलियों पर गोलियां चलने लगीं हम सबने ये सोचा ही नहीं की हम लोग बर्फ़ के ढके पहाड़ों से घिरे हैं, गोलियों की आवाज़ से कुछ पहाड़ों की बर्फ टूट कर गिरने लगी जिसके सैलाब में उनके काफ़ी साथी दब गए, हम सबने सोचा अब हमारा जीत हो गया, सब चट्टानों के पीछे से बाहर निकले और गुफ़ा की तरफ बढ़ने लगे। इतने में उनके बचे हुए कुछ लोगों ने तलवारों से हमला कर दिया, काफ़ी देर मुदभेड़ चली, हमारे सभी साथी एक एक कर मौत के घाट उतार दिए गए क्यूँकि गोलियां चलाने का मौका नहीं मिला। 


हमारा मुकाबला लूटेरे के सरदार के साथ हो रहा था, जहाँ हमने उसे पहला बार आमने सामने देखा था, वो एक सिक्ख समुदाय का था। अब तक जब भी दूर से देखा था तो केवल शाल से लिपटा हुआ ही देखा था, चेहरा भी हमेशा ढका हुआ रहता था। हम दोनों के बीच घमासान मुकाबला हुआ। पर तलवार बाज़ी में वो ज़्यादा माहिर था, 

हमारा गर्दन काटने से पहले हमसे कहा "हमारा लड़ाई तुमसे नहीं था फिरंगी, हम अपने छठे गुरु का बदला लेने के उद्देश्य से शाहजहाँ का ये ख़ज़ाना लूट कर लाए थे, कितना लंबा इंतजार करना पड़ा ये बग़ावत तब से शुरू की थी जब हमारे छठे गुरु मरे थे , कितने मेहनत से एक बादशाह को मात दी, ये ख़ज़ाना तो हम किसी मुग़ल सल्तनत से जुड़े इंसान के हांथों नहीं लगने देंगे। माफ़ करना पर तुम्हें भी मरना पड़ेगा और हर उस आदमी को मिटा देंगे जो हमारे गुरु के सम्मान को ठेस पहुंचाएगा"। इतना बोलते ही हमारे सिर को धड़ से अलग कर दिया और गुफ़ा को बंद कर दिया बगल में रखे बड़े पत्थर से। बाद में हमको उसी गुफा के सामने पत्थर से टिका कर बैठा दिया और सिर को हांथों में कुछ इस तरह रखा, मानो ख़ुद सिर गोद में रखा हो, फिर बाकी बचे अपने चार साथियों के साथ चला गया। 


पर पहाड़ों के नीचे उतरते ही उसे औरंगजेब के मित्र ने बन्दी बना लिया काफ़ी पूछताछ के बाद भी उसने कुछ नहीं बोला,अपना नाम तक नहीं बताया, कुछ दिनों तक प्रताड़ित होने के बाद उसने कारगर में ही दम तोड़ दिया। उसके आखिरी शब्द यही थे "वाहे गुरु जी दा खालसा वाहे गुरु जी दी फतेह"। 


तीन सौ सालों से अधूरी इच्छाओं को लिए उन्ही बर्फीली पहाड़ियों पर इंतज़ार करते और ख़ज़ाने की हिफाज़त करते हुए मेरी आत्मा में इतना बल आ गया कि इसके शरीर से जुड़ते ही इसमें अलौकिक शक्ति आ जाती है। कितनी इच्छाएँ ऐसी थीं जो दिल ही में दब कर रह गईं जैसे एमेलिया के साथ शादी करके उसे इज़्ज़त का जीवन देना, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को ख़ज़ाना दे कर अपना कर्तव्य पूरा करना इत्यादि"। 


कमांडर की कहानी सुन कर मुझे इस बात का अंदाजा हो गया कि इस जीवन में धन दौलत का कोई अर्थ नहीं है अगर अपने साथ न हों। उस दिन सुबह उसके सिर को कपड़े के झोले में कर उसे संदूक में बंद करने से पहले उसने मुझसे कहा" तुमको जो डॉक्टर ज़ाकिर ने हीरे दिए हैं उन्हें तुम तब तक नहीं बेच पाओगे जब तक मुझे मेरा शरीर नहीं मिल जाता है, एक राज़ है जो मैं सिर्फ अपने धड़ और सिर को जोड़ने में मदद करने वाले को ही बताऊंगा", इसलिए डॉक्टर ज़ाकिर से मैंने उनकी बड़ी हवेली ख़रीदी क्यूँकि कमांडर का शरीर उनके पास था और सिर को मैंने नैनीताल वाले फ़ार्म हाउस में रख दिया, वहीं पर दो हांथी दाँत से बने हाथियों की मूर्ति मिलेगी जिनकी पीठ पर हल्का सा उभार है उसे दबाते ही उनकी पीठ का ढक्कन खुल जाएगा जिसमें हीरे हैं, दोनों हाथियों में पचास पचास हीरे हैं जिनकी कीमत करोड़ों में है। हम इस काम को इसलिए अंजाम नहीं दे पाए क्यूँकि अपनी बेगम की ज़िम्मेदारी भी मेरे ऊपर थी और इन बूढ़ी हड्डियों में अब इतनी ताकत नहीं बची थी जो आगे की चुनौती पूरी कर पाते। पता नहीं ऐसा कौन सा राज़ कमांडर के सीने में दफ़न है। इसका पता तो उसी को चलेगा जो उसके शरीर से सिर को मिलाने में उसकी मदद करेगा लेकिन इसमें ख़तरा भी हो सकता है।

                       To Be Continued... 

                     ©ivanmaximusedwin 


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  • 👌👌

    Dec 10, 2020

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