प्रश्न हमार Read Count : 20

Category : Poems

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हो गयल भवसागर जे पार , ताके उहो तड़ेर के आंख ।
सोच समझ के दिहीं जबाब , ना बा कउनो अलग दबाव ।
चतुराई से तरकस रखले शान पे बान चलउलस के ,
पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 

हम त बिगरल काम बनाईं , पानी पर सेतु पऊड़ाईं ।
मोर क्षमता पे प्रश्न तोहार , फिर से तनिका करा बिचार ।
सागर के पुरुसारथ अपने अंजुरी से खरकउलस के ,
पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 

अवधपुरी के हईं दुलार , काशी मथुरा हवे हमार ।
शिल्पकार हम गंगा के , डमरू शिव अड़भंगा के ।
केशव के उ चक्र सुदर्शन अंगूरी में पहिनउलस के ,
पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 

ना केहुओ से राखी तोड़ , सबका खातिर चार चार गोड़ ।
राम के हाथे धनुष थमउली , संसाधन सबका पहुँचउली ।
शस्त्र शास्त्र के विद्या हमरै हमहि से लुकवऊलस के ,
पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के । 

केसे केकर रहल लड़ाई , हम ना कबहुँ बैर निभाईं ।
हम केकरा के रहीं चुनौती , जे एह गति के हमरो हस्ती ।
कहे कथानक जे कथावाचक हमरै कथा छुपउलस के ,
पिछड़ा कह पिछियउलस के । पिछड़ा कह पिछियउलस के ।

✍ धीरेन्द्र पांचाल
 

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  • Sep 12, 2020

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