प्रकृति की ओर Read Count : 104

Category : Poems

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है धरा जहा पर हरा भरा 
नव जीवन प्रफुल्लित पल पल  में 
लगता नहीं ये जहा यहाँ ,
है बनता स्वर्ग यह पल पल में !

मैं दूर प्रकृति से कष्टों  में,
सुख भौतिकता जहा  दिखाती है,
है स्वार्थ भरे इस जग में 
न कोयल गीत सुनाती है !
          चल रे मन तुझे प्रकृति बुलाती  है !

प्रातः पंछी जगाकर बुलाती है ,
हर रात का  दिन से मिलकर जाना ;
सर सर हवा झरते झरनों का ,
राग प्रकृति जहाँ गाती है ! 

चिड़ियाँ जागती  और जगाती ,
सूरज  स्वर्णिम रंग बिखेरता ;
भौरे  कलियों को  फूल बनाकर 
गज़ल परियों को सुनाती है !
      चल रे मन  तुझे   प्रकृति   बुलाती है !
                                    R.k.Tarun.
हर पग पर प्रकृति का रंगमंच  है ;
हर कला वह दिखाती है !
चाहे कितना हो दही ये मन 
हर मन को सुख दिलाती  है !

टिम टिम करते ओस  बूंद की 
गले किरणों को लगाती  है ;
मानो  सितारे उतरे उतरे है जग पर 
हर मन में प्रेम जगाती है !
            चल रे मन .............................!
यहाँ  चलें है सुख के लिए मनु 
ये विरोध  प्रकृति का करती है ;
खुशियों की तलाश  लिए ये 
दुखों में ही रह जाती है !

सर सर यूँ जब हवा चले 
नव रंगों  संग नव फ़ूल खिले ;
फिजा में बच्चो का कोलाहल 
हर आँगन को मेहका जाती है !
    चल रे मन  तुझे प्रकृति  बुलाती है !
                                 R.k.Tarun.




  
 



 

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